श ष स ह
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श (45)
- शरण कोई नहीं जग में
- शरण में जिनवर की आए, हाँ आए
- शांत मुद्रा निहारी जो अरिहंत की
- शांति वरन मुनिराई वर लखि
- शांति सुधा बरसा गये
- शान्त छवि निरखी
- शान्त स्वरूप अहो अन्तर में, बहती समरस धार रे
- शान्ति जिनवर झलकती है, आपकी शान्त मूरति से
- शान्ति प्रभो, शान्ति प्रभो
- शान्ति विधायक मंगलदायक, शान्ति जिनेश्वर नमन करूँ
- शान्ति सुधा बरसा गये
- शान्ति सुधा बरसाये
- शान्तिनाथ भगवान् ! मैं भी होऊँ आप समान
- शाश्वत चिद्रूप अहो
- शाश्वत जीवन ज्ञानमयी, ज्ञानमयी, आनन्दमयी
- शाश्वत तीर्थ अहो अंतर में, सुख स्वरूप सुखकार रे
- शाश्वत प्रभुता है चैतन्य धाम में
- शासन ध्वज लहराओ
- शास्त्रों की बातों को
- शिक्षावली
- शिखर पे कलश
- शिव सुख दायक त्रिभुवन नायक, वीर जिनेश्वर जय-जय-जय
- शिव सुखदाता जैनधर्म
- शिवपुर की डगर समरससौं भरी, सो विषय विरसरचि चिरविसरी
- शिवमगदरसावन रावरो दरस
- शिवसुखदानी है जिनवाणी
- शुद्ध चिद्रूप, शुद्ध चिद्रूप
- शुद्ध चैतन्य भाव अनुभवते, नय पक्षों के साक्षी हैं
- शुद्ध वस्त्र तन पर धारण कर
- शुद्ध स्वरूपको वंदना हमारी
- शुद्ध-बुद्ध है रूप तुम्हारा, पर भावों से अति ही न्यारा
- शुद्धातम अविकारी, शुद्धातम सुखकारी
- शुद्धातम आयो दृष्टि में, आनन्द भयो सब सृष्टि में
- शुद्धातम की बात बतादो वीरा
- शुद्धातम तत्व विलासी रे
- शुद्धातम सुखकार हो
- शुद्धातम ही ध्रुव परमेष्ठी
- शुद्धातम-शुद्धातम, हूँ कारण परमातम
- शुद्धात्म चेतन हूँ इस जग से न्यारा हूँ
- शुद्धात्म सहज सुन्दरतम
- शुद्धात्मा का श्रद्धान होगा
- शुद्धात्मानुभूति ही है नित्य मंगलमय
- शुभ काललब्धि जागी भगवन
- शेष सुरेश नरेश रटें तोहि, पार न कोई पावै जू
- शोभे प्रभु स्वरूप अविकार
ष (1)
स (165)
- संत/सन्त वंदन
- संबोधन
- संबोधनाष्टक
- संयताष्टक
- संयम भावना
- संसार भव सगरिया
- संसार महा अघसागर
- संसार लगने लगा अब असार
- संसारमें साता नाहीं वे
- सच्चे जिनवर सच्चे
- सज धज कर जिस दिन
- सत्ता रंगभूमिमें, नटत ब्रह्म नटराय
- सत्य सनातन जैन धरम
- सत्य सनातन धर्म प्यारा लगता है
- सदा काल प्रभु पूरा
- सन्त निरन्तर चिन्तत
- सन्त साधु बनके विचरूं
- सन्त-वन्दन
- सफल है धन्य धन्य वा घरी
- सब जगको प्यारा, चेतनरूप निहारा
- सब जैन धर्म की जय बोलो
- सब तत्त्वों में सार मेरा समयसार प्यारा
- सब मिल के आज जय कहो
- सब मिल देखो हेली म्हारी हे, त्रिसलाबाल वदन रसाल
- सब विधि करन उतावला
- सबसे सुन्दर आतमराम, अक्षय सुखमय आतमराम
- सबसे सुन्दर आत्मा, ज्ञानानंदमय आत्मा
- सबसों छिमा छिमा कर जीव
- सम आराम विहारी
- समकित से कब निज आतम का श्रृंगार करोगे
- समझो-समझो रे धरम को सार, सुखी तुम होवोगे
- समता भाव सदा ही सुखमय
- समयसार अविकार प्रभु, निर्विकल्प निज माँहि रहूँ
- समयसार अविकारा जी, समयसार सुखकारा जी
- समयसार भक्ति (रे समयसार की पूजा)
- समयसार ही परमामृत है, भविजन के मन भाए
- समवशरण आएँ भक्तों की टोलियाँ
- समवशरण मनहारी, प्रभु का समवशरण मनहारी
- समवशरण में अहो ! विदेहीनाथ विराजे हैं
- समवसरण आएँ भक्तों की टोलियाँ
- समुझ सबद यह मेरा
- सम्बोधन
- सम्बोधन (सदा संतोष कर प्राणी)
- सम्मेद शिखर पर मैं जाऊंगा
- सम्मेद शिखर, सम्मेद शिखर
- सम्मेदशिखर हमको प्राणों से प्यारा, तीर्थराज हमको है प्राणों से प्यारा
- सम्मेदशिखर-सम्मेदशिखर, शाश्वत तीर्थक्षेत्र सुखकर
- सम्मेदशिखर-सम्मेदशिखर, हम करें वंदना आनंदकर
- सम्यक्ज्ञान करो, सफल होय पर्याय
- सम्यक्त्व के आठ अंग
- सम्यग्ज्ञान बिना तेरो जनम अकारथ जाय
- सम्यग्दर्शन माहात्म्य
- सम्यग्दर्शन माहात्म्य (सम्यग्दर्शन मित्र हमारा, देता)
- सम्यग्दर्शन मूल धर्म का, ये सर्वज्ञ उचारा है
- सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र, जीवन हमारा है
- सरसब्ज उजड़ते देखे हैं, उजड़ों को भी बसते देखा है
- सरस्वती वंदना ( प्राकृत और संस्कृत में )
- सर्वज्ञ शासन जयवन्त वर्ते
- सर्वज्ञता का धाम हो
- सहज अबाध समाध धाम तहाँ
- सहज तत्त्व आनन्दमय, सहज तत्त्व अविकार
- सहज निराकुल परम शान्तिमय, प्रभुवर स्वाश्रित जीवन हो
- सहज पवित्र, सहज सुखधाम, ज्ञाता रूप परम अभिराम
- सहज रहो, कुछ नहीं कहो
- सहज स्वयं में तृप्त सदा ही
- सहजानन्दमय ज्ञानानन्दमय, परम भाव जयवन्त अहो
- सहजानन्दी शुद्ध स्वरूपी
- सांची तो गंगा
- सांवरिया पारसनाथ शिखर पर
- सांवरियाके नाम जपेतैं, छूट जाय भवभामरिया
- सात शतक मुनियों की रक्षा
- साधक की विश्व को चुनौती
- साधना के रास्ते, आत्मा के वास्ते
- साधना जैन मुनियों
- साधु दशा प्रगटायेंगे, सिद्ध दशा प्रगटायेंगे
- साधो छोडौ विषै विकारी
- सारद ! तुम परसाद तैं
- सारा पुण्य पाप का खेल, जगत् में देखो आँख पसार
- सारौ दिन निरफल खोयबौ करै छै
- सिद्ध चक्र मण्डल विधान
- सिद्ध प्रभु की भक्ति करते, हृदय हर्षित होता है
- सिद्ध भक्ति- कर्मों का जिसने नाश किया
- सिद्ध भावना
- सिद्ध स्वरूप सु भावे
- सिद्धचक्र का पाठ रचाया, सब मिल पूजन कर लो
- सिद्धचक्र की स्तुति (पं. मक्खनलाल)
- सिद्धचक्र को पाठ रचाया, आनंद छाया है
- सिद्धचक्र मंडल विधान हो रहा
- सिद्धभक्ति
- सिद्धारथ राजा दरबारे
- सिद्धालय जाना है
- सिद्धालय में वीर विराजे, बोलो जय जयकार जी
- सिद्धों का मैं सिद्ध हूँ, मैं ज्ञायक भगवान
- सिद्धों की आत्मा से
- सिद्धों की भूमि सम्मेदाचल
- सिद्धों की श्रेणी
- सिद्धों से मिलने का मार्ग
- सीमंधर मुख से फुलवा खिरे
- सीमंधर संदेशा है
- सीमंधर स्वामी, आए शरण तुम्हारी
- सीमंधर स्वामी, मैं चरनन का चेरा
- सीमन्धर स्वामी ! निज सीमा में आऊँ
- सुख आते हैं, दुःख आते हैं,
- सुख का है यही उपाय मात्र
- सुख की खोज
- सुधि लीज्यौ जी म्हारी, मोहि भवदुखदुखिया जानके
- सुन चेतन इक बात हमारी
- सुन चेतन चतुर सुजान, अब मन लाओ जिनवाणी
- सुन जिन बैन, श्रवन सुख पायौ
- सुन ज्ञानी प्राणी, श्री गुरु सीख सयानी
- सुन ज्ञानी प्राणी, श्रीगुरु सीख
- सुन प्राणी जिनवाणी
- सुन प्राणी जिनवाणी, सफल होय जिन्दगानी
- सुन री सखी! मैं तो जोगिन बनूंगी, जोगी बने हैं साँवरिया
- सुन रे जिया चिरकाल गया
- सुन ले ध्यान लगा कर ध्यानी
- सुन सुन रे चेतन प्राणी - नित ध्यालो जिनवरवाणी
- सुन, सुन, सुन
- सुनकर वाणी जिनवर की
- सुनरे गँवार, नितके लबार, तेरे घट मँझार परगट दिदार
- सुनलो प्रभु अरज हमारी, मोहि जिनवर शरण तुम्हारी
- सुनि सुजान! पांचों रिपु वश करि, सुहित करन असमर्थ अवश करि
- सुनि सुनि हे साथनि! म्हारे मनकी बात
- सुनी जब मैंने जिनवाणी (कवि राजमल पवैया)
- सुनी ठगनी माया, तैं सब जग ठग खाया
- सुनो चेतन तेरी ज्ञान स्वरूप आतम को
- सुनो जिनवाणी
- सुनो जिया ये सतगुरु
- सुनो जैनी लोगो ! ज्ञानको पंथ सुगम है
- सुनो प्रभु जी अरज हमारी, मेरा काज तुमसे अटका
- सुनो सुनो रे जिनवाणी
- सुन्दर दशलक्षन वृष सेय सदा
- सुमर सदा मन आतमराम
- सुर से सुनाऊँ, सरगम से सुनाऊँ
- सुरनरसुखदाई, गिरनारि चलौ भाई
- सुरपति ले अपने शीश
- सो गुरुदेव हमारा है साधो
- सो ज्ञाता मेरे मन माना
- सो मत सांचो है मन मेरे
- सोग न कीजे बावरे! मरें पीतम लोग
- सोचो जरा कहता क्या है
- सोती थी मरुदेवी माता
- सोते-सोते ही निकल गयी सारी
- सोलह सपने आए जी…Solah Sapne Aaye Ji
- सोलह सपनो का फल बतलाओ
- सोलह स्वपन, मैंने देखे हैं साजन
- सोहां दीव (शोभा देवें) साधु तेरी बातड़ियां
- सौ सौ बार हटक नहिं मानी, नेक तोहि समझायो रे
- स्तुति चन्द्रप्रभ जी की, चन्द्र सम उज्ज्वल छवि जिनकी
- स्वप्न फल
- स्वयं सिद्ध प्रभु सार, सहजानन्द विलसे
- स्वयं सिद्ध शुद्धात्मा महिमा अपरम्पार रे
- स्वयं-स्वयं में सार है, समयसार अविकार है
- स्वयमेव इस जगत् का सब काम हो रहा है
- स्वरूप सब जीवन को
- स्वर्ग से सुंदर
- स्वर्ग से सुन्दर अनुपम
- स्वागत करते आज तुम्हारा
- स्वागतम् जिनवरम्
- स्वाध्याय महिमा
- स्वानुभव के बिना
- स्वामी तेरा मुखड़ा है
- स्वामीजी सांची सरन तुम्हारी
- स्वावलम्बी निरवलम्बी, निरवलम्बी रहूँगा मैं
- स्वावलम्बी निरालम्बी, निरालम्बी रहूँगा मैं
ह (112)
- हथनापुर बंदन जइये हो
- हम अगर वीरवाणी पर
- हम आतम ज्ञानी, हम भेद विज्ञानी
- हम आये हैं जिनभूप! तेरे दरसन को
- हम चर्चा करते आये हैं
- हम तो कबहुँ न निज घर
- हम तो कबहुँ न निज घर आये
- हम तो कबहुँ न निजगुन
- हम तो कबहूँ न हित
- हम दिगम्बर मुनिवरों के दास के भी दास हैं
- हम न किसी के
- हम न किसी के कोई न
- हम बैठे अपनी मौन सौं
- हम यही कामना करते हैं
- हम लाए हैं विदेह से
- हम लागे आतमराम सों
- हम सब ज्ञायक हैं
- हमको कछु भय ना रे
- हमको कैसे शिवसुख होई
- हमको भी बुलवालो स्वामी
- हमने अपने में ही महज़बीं देख लिया
- हमने तो घूमी चार गतियाँ
- हमारी वीर हरो भवपीर
- हमारे प्रभु परमेष्ठी अविकार
- हमारे ये दिन यों ही गये जी
- हमारो कारज ऐसे होइ
- हमारो कारज कैसै होइ
- हमें निज धर्म पर चलना
- हर आत्मा में देखो
- हरष हरष गुण गायेंगे, परम प्रभु को ध्यायेंगे
- हरी तेरी मति नर कौनें हरी
- हरो पीर मेरी
- हाय इन भोगों ने क्या रंग दिखाया मुझको
- हुआ सवेरा अब उठ जाओ
- हुआ सहज विश्वास, नाथ मैं जिनपद पाऊँगा
- हूँ तो कहा करूँ कित जाऊँ, सखी अब कासौं पीर कहूं री!
- हूँ स्वतंत्र निश्चल निष्काम
- हे ! अनन्त चतुष्टयवन्त, सर्व भगवन्त, परम उपकारी
- हे आतमा ! देखी दुति तोरी रे
- हे आदीश्वर ! तुम प्रभुता का नहिं पार दिखावे
- हे आदीश्वर भगवान्, करूँ गुणगान हर्ष मन भारी
- हे ऋषभ जिनेश्वर ! अनाहारी पद पाऊँ
- हे कुंदकुंद आपने सच्चा
- हे कुंद-कुंद आपने सच्चा पथ दिखा दिया
- हे कुन्दकुन्द शिवचारी गुरुवर
- हे कुन्दकुन्द शिवचारी, गुरुवर लाखों प्रणाम
- हे चन्द्रप्रभ जिनराज ! मूरति मंगलकारी
- हे जिन तुम गुन
- हे जिन तेरे मैं शरणै आया
- हे जिन तेरो सुजस उजागर
- हे जिन मेरी ऐसी बुधि कीजै
- हे जिनराज बरसे
- हे जिनवाणी माता! तुमको लाखों
- हे जिनेश्वर धन्य
- हे ज्ञान… हे ज्ञान
- हे तीन भुवन के स्वामी, सुनो
- हे तीन लोक की मात
- हे द्वादशांग वाणी, जय हो सदा विजय हो
- हे धर्म पिता सर्वज्ञ ! हे वीतराग सर्वज्ञ
- हे नर निपट गंवार
- हे नर, भ्रमनींद क्यों न छांड़त दुखदाई
- हे परम दिगम्बर यति
- हे परमात्मन् ! तुझको पाकर अब मुझको चिन्ता ही क्या
- हे परमात्मन् ! तुम साक्षी में
- हे पारस स्वामी ! जीवन हो निर्दोष
- हे पार्श्व प्रभो आदर्श रहो
- हे पार्श्व प्रभो ! तव दर्शन कर, मन में अति ही आनन्द हुआ
- हे पार्श्व प्रभो शिवदाता
- हे प्रभु चरणों में तेरे
- हे प्रभुवर तुम चरण प्रसाद, निज पद की नहीं भूलूँ याद
- हे प्रभो चरणों में तेरे
- हे भविजन ध्या लो आतमराम
- हे भव्य महा उद्यम से, जिन तत्त्वों को जानो
- हे मन तेरी को कुटेव यह, करनविषय में धावै है
- हे माँ जिनवाणी आतम रूप सु ध्याऊँ
- हे मात करुणा कर मुझे, अब गोद में ले प्यार दे
- हे मेरे महावीरा वंदन तेरा करूँ मैं
- हे वीतराग भगवान्, सहज गुणखान
- हे वीर प्रभूजी हम पर, अनुपम उपकार तुम्हारा
- हे वीर रे, आए हैं तेरे हम द्वार
- हे वीरनाथ! तुम दर्शन कर
- हे वीरनाथ तुम दर्शन कर मन में अति ही आनन्द हुआ
- हे वीरनाथ! मैं भक्तिभाव से नमन करूँ
- हे वीरा प्रभु महान
- हे शारदे माँ, हे शारदे माँ
- हे स्याद्वाद माता
- हे हितवांछक प्रानी रे, कर यह रीति सयानी
- है अगम्य अनमोल अनंती सुखदाई जिनवाणी
- है उपादेय तिहूँ लोक में, अकेलो शुद्धातम
- है तेरे घर में जो आतम, उसे तू पर में क्या ढूंढे
- है धर्म यहाँ की रीत सदा
- है परम दिगम्बर मुद्रा जिनकी
- है यही भावना हे स्वामिन्
- हो जागो जी चेतन अबतो सवेरो मोह नींद विसारोजी
- हो जिनवानी जू, तुम मोकौं तारोगी
- हो तुम त्रिभुवनतारी हो जिन जी, मो भवजलधि क्यों न तारत हो
- हो तुम शठ अविचारी जियरा, जिनवृष पाय वृथा खोवत हो
- हो दिगम्बर ध्याऊँ निजपद, धन्य घड़ी कब आयेगी
- हो प्यारा चेतन अब तो संभारो ज्ञान गुण धारो रे
- हो भविजन ज्ञान सरोवर सोई
- हो भैया मोरे! कहु कैसे सुख होय
- हो मनाजी, थारी वानी बुरी छै, दुखदाई
- हो श्री जिनवर की पूजा
- होगी धन्य घड़ी जब प्रभुवर, विचरूँ सहज दिगम्बर वेश
- होड़ लगी है होड़ लगी, प्रभु भक्ति की होड़ लगी
- होरी खेलूंगी घर आए चिदानंद
- होरी हो रही हो नगर में
- होली खेले अकेले रे वन में
- होली खेलें मुनिराज
- होवे कब निर्ग्रन्थ दशा
- होवे प्रभुवर सहज जीवन, होवे जिनवर सफल जीवन
- होवे साधु दशा सुखकारी
संयुक्ताक्षर (क्ष त्र ज्ञ श्र)
क्ष (3)
त्र (6)
- त्रिभुवन के नाथ प्रभु झूल रहे पलना
- त्रिभुवन स्वामी चेतननामी, काहे बनो दिलगीर
- त्रिभुवनआनन्दकारी जिन छवि, थारी नैननिहारी
- त्रिशला के नन्द तुम्हें
- त्रिशला देवी के आँगन में
- त्रिशला नंदनं, वीर जिनेश्वरम्
ज्ञ (38)
- ज्ञाता दृष्टा राही हूँ
- ज्ञाता सोई सच्चा वे, जिन आतम अच्चा
- ज्ञान का ज्ञेय बनाते चलो, समता भाव बढ़ाते चलो
- ज्ञान की चांदनी जिसके
- ज्ञान की ज्योति जलाते चलो
- ज्ञान गंगा में नित प्रति नहाओ, मैल रागादि का तुम छुड़ाओ
- ज्ञान गगन के तले
- ज्ञान ज्ञेयमाहिं नाहिं, ज्ञेय हू न ज्ञानमाहिं
- ज्ञान दर्शन लक्षण
- ज्ञान बिन थान न पावौगे
- ज्ञान मात्र ध्रुव सुखमय ज्ञायक, अहो दृष्टि में आया
- ज्ञान सम्यक् मेरा हो गया
- ज्ञान सुधारस पीजे रे भाई, सुधारस पीजे रे
- ज्ञान स्वभावी आत्मा, स्वयंसिद्ध परमात्मा
- ज्ञान स्वरूपी चेतन अनुभव में
- ज्ञान ही आत्म साधक का आख्यान है
- ज्ञान ही सुख है, राग ही दुःख है
- ज्ञानमयी चेतन तुझे जग
- ज्ञानमयी मुरली बजाये जिनवाणी
- ज्ञानमात्र ही प्रतिक्रमण है
- ज्ञानाभ्यास करो मुक्तिमार्ग मिले
- ज्ञानामृत सिन्धु रे
- ज्ञानी आत्मा ही निज रूप धारे, भेद-विज्ञान ऐसे विचारे
- ज्ञानी ऐसे होली मचाई
- ज्ञानी का धन ज्ञान
- ज्ञानी का ध्यानी का, सबका कहना है
- ज्ञानी की ज्ञान गुफा में
- ज्ञानी की निर्भयता
- ज्ञानी के सहारे हो
- ज्ञानी जीव निवार भरम तम
- ज्ञानी ज्ञानी ज्ञानी, नेमिजी ! तुम ही हो ज्ञानी
- ज्ञानी ! थारी रीति रौ अचंभौ मोनैं आवै
- ज्ञानी मुनिवर सुखी महान्, सतत करें आतम का ध्यान
- ज्ञानेश्वर अन्य क्या करने जाए
- ज्ञायक उसके लक्ष्य में आवे
- ज्ञायक का ही आश्रय होवे, यही जगत् में सार रे
- ज्ञायक ज्ञायक लखते लखते, बीते काल अनन्त रे
- ज्ञेय प्रतिभासें तो प्रतिभासें
श्र (51)
- श्रद्धा ने ज्ञायक प्रभु स्वीकारा
- श्री अक्षय तृतीया भक्ति
- श्री अरहंत सदा मंगलमय
- श्री अरहन्त सदा मङ्गलमय
- श्री अरिहंत छवि लखि हिरदय
- श्री आदिनाथ स्तुति
- श्री केवलज्ञान भक्ति
- श्री चन्द्रप्रभ आरती
- श्री चन्द्रप्रभ स्तुति
- श्री चौबीस तीर्थंकर भक्ति
- श्री जिन मेरा सदा है तुमको नमन
- श्री जिनधर्म महान्, जग में श्री जिनधर्म महान्
- श्री जिनवर का मंगल शासन, सहजपने स्वीकार हमें
- श्री जिनवर दरबार, खेलूंगी होरी
- श्री जिनवर पद ध्यावे जे नर
- श्री जिनवेदी शिलान्यास भक्ति
- श्री जी मैं थाने पूजन आयो
- श्री दशलक्षण धर्म अमोलक
- श्री देव-शास्त्र-गुरु भक्ति
- श्री नंदीश्वर जिनधाम भक्ति
- श्री नंदीश्वर द्वीप पूजन
- श्री नंदीश्वर भक्ति
- श्री नेमि प्रभो ! जिन नेमि जिन, हो द्रव्य नमन, हो भाव नमन
- श्री नेमीकुंवर गिरनारी चाले
- श्री पंच बालयति स्तुति
- श्री पंचकल्याणक भक्ति
- श्री पंच-परमेष्ठी भक्ति
- श्री पद्मप्रभु चालीसा
- श्री पार्श्वनाथ चालीसा
- श्री पार्श्वनाथ स्तुति
- श्री पार्श्वनाथ स्तुति - मेरो जन्म सफल भयो आज
- श्री बाहुबली स्तुति (बाहुबली की शान्त मुद्रा)
- श्री भक्तामर पाठ भक्ति
- श्री मल्लिनाथ स्तुति
- श्री महावीर जयन्ती भक्ति
- श्री महावीर स्वामी स्तुति
- श्री मुनि राजत समता संग
- श्री रक्षाबंधन पर्व भक्ति
- श्री वीर का शासन मंगलमय, महावीर का शासन मंगलमय
- श्री वीर निर्वाणोत्सव भक्ति
- श्री वीर शासन जयन्ती
- श्री शांतिनाथ स्तुति
- श्री शान्तिनाथ स्तुति
- श्री श्रुतपंचमी भक्ति
- श्री समयसार भक्ति
- श्री समयसार महिमा
- श्री सम्मेदशिखर जी भक्ति
- श्री सीमंधर स्तुति
- श्रीगुरु हैं उपगारी ऐसे वीतराग गुनधारी वे
- श्रीजिनधर्म सदा जयवन्त
- श्रेष्ठतम जिनवर नमन करूँ