तर्जःनिर्ग्रन्थ मार्ग में विचरूँ …
श्री नेमि प्रभो ! जिन नेमि जिन, हो द्रव्य नमन, हो भाव नमन ।। टेक ।।
दर्शन पाकर प्रभु धन्य हुआ, संक्लेश भाव सब दूर हुआ।
अद्भुत आनन्द उल्लसित हुआ।। श्री नेमि. ।। 1।।
मिथ्या अपनत्व नशाया है, संसार असार दिखाया है।
शिवमार्ग सहज प्रत्यक्ष हुआ।। श्री नेमि. ।। 2।।
होता यदि जग में सार विभो, फिर क्यों तजते संसार प्रभो ।
चित यह विचार निश्चिंत हुआ।। श्री नेमि. ।। 3।।
भोगों की चाह रही न प्रभो, निर्ग्रन्थ मार्ग ही इष्ट अहो।
वैराग्य सहज ही प्रगट हुआ।। श्री नेमि. ।। 4।।
अद्भुत वैराग्य आपका है, अनुपम संदेश आपका है।
मूरति लखकर कृतकृत्य हुआ।। श्री नेमि. ।। 5।।
बस हो अब सर्व विकल्पों से, निज प्रभुता प्रगटेगी निज से।
निरपेक्ष सु जाननहार हुआ ।। श्री नेमि. ।। 6।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १०६
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’