Category Topics

द्रव्यानुयोग

द्रव्यानुयोग में द्रव्योंका व तत्वोंका निरूपण करके जीवोंको धर्ममें लगाते हैं।
जो जीव जीवादिक द्रव्योंको व तत्वोंको नहीं पहिचानते, आपको-परको भिन्न नहीं जानते, उन्हें हेतु-दृष्टान्त युक्ति द्वारा व प्रमाण-नयादि द्वारा उनका स्वरूप इस प्रकार दिखाया है जिससे उनको प्रतीति हो जाये। उसके अभ्याससे अनादि अज्ञानता दूर होती है। अन्यमत कल्पित तत्वादिक झूठ भासित हो तब जिनमत की प्रतीति हो और उनके भावको पहिचानने का अभ्यास रखें, तो शीघ्रही तत्वज्ञान की प्राप्ति हो जाये।
62

चरणानुयोग

चारित्र ही सच्चा धर्म है। चरणानुयोगमें नानाप्रकार धर्मके साधन निरूपित करके जीवों को धर्ममें लगाते हैं। जो जीव हित-अहित को नहीं जानते, हिंसादिक पाप कार्योंमें तत्पर होते हैं, उन्हें जिसप्रकार पाप कार्यों को छोड़कर धर्मकार्योंमें लगें, उस प्रकार उपदेश दिया है, उसे जानकर जो धर्म आचरण करने को सन्मुख हुए, वे जीव गृहस्थधर्म व मुनिधर्म का विधान सुनकर आपसे जैसा सधे वैसे धर्म-साधनमें लगते हैं।
79

प्रथमानुयोग

प्रथमानुयोग में तो संसार की विचित्रता, पुण्य-पापका फल, महन्तपुरुषोंकी प्रवृत्ति से जीवों को धर्म में लगाया है।
जो जीव तुच्छबुद्धि हों वे भी उससे धर्म क्योंकि वे जीव सूक्ष्म निरूपणको नहीं पहिचानते, लौकिक कथाओं को उनका उपयोग लगता है। तथा प्रथमानुयोग में लौकिक प्रवृतिरूप ही निरूपण होने से उसे वे भली-भाँति समझ जाते हैं।
तथा लोकमें तो राजादिककी कथाओं में पापका पोषण होता है। यहाँ महन्तपुरुष राजादिककी कथाएँ तो हैं, परन्तु प्रयोजन जहाँ तहाँ पापको छुड़ा कर धर्ममें लगानेका प्रगट करते हैं, इसलिये वे जीव कथाओंके लालच तो उन्हें पढ़ते-सुनते हैं और फिर पापको बुरा, धर्मको भला जानकर धर्ममें रुचिवंत होते हैं।
27

करणानुयोग

करणानुयोग में जीवोंके व कर्मो के विशेष तथा त्रिलोकादिककी रचना निरूपित करके जीवोंको धर्ममें लगाया है।
जो जीव धर्ममें उपयोग लगाना चाहते हैं वे जीवोंके गुणस्थान-मार्गणा आदि विशेष तथा कर्मों के कारण-अवस्था-फल किस-किसके कैसे-कैसे पाये जाते हैं इत्यादि विशेष तथा त्रिलोकमें नरक स्वगादिके ठिकाने पहिचान कर पापसे विमुख होकर धर्ममें लगते हैं तथा ऐसे विचारमें उपयोग रम जाये तब पाप-प्रवृत्ति छूटकर स्वयमेव तत्काल धर्म उत्पन्न होता है; उस अभ्यास से तत्वज्ञानकी भी प्राप्ति शीघ्र होती है। तथा ऐसा सूक्ष्म यथार्थ कथन जिनमतमें ही है, अन्यत्र नहीं है; इसप्रकार महिमा जानकर जिनमतका श्रद्धानी होता हे ।
92

Content

Page to be updated soon…
12
181
62

Site Feedback

Discussion about this site, its organization, how it works, and how we can improve it.
1

JinSwara Updates

Updates regarding JinSwara.
10
3