सहज तत्त्व आनन्दमय, सहज तत्त्व अविकार ।
सहज तत्त्व के ध्यान से, सहज रूप अविशेष ।
जो ध्यावे सो शिव लहे, रहे न दुःख लवलेश ।।1।।
सहज तत्त्व को प्राप्त कर, सहज हुआ कृतकृत्य ।
चिद्-विभूति अद्भुत लखी, आनन्द हुआ प्रत्यक्ष ।।2।।
जिनवाणी नित बोधनी, नित्य तत्त्व दरशाय ।
नित्य प्रभु की शरण से, नित्यानन्द विलसाय ।।3।।
अरे! विपत्ति मोह है, सम्पत्ति जानी ज्ञान ।
नित्य शुद्ध सम्पत्ति लखी, परमानन्द की खान ।।4।।
प्रगट्यो भेद-विज्ञान उर, आनन्द अपरम्पार ।
परीषह या उपसर्ग का, भय नहीं रहा लगार ।।5।।
भेद विकल्पातीत निज, शुद्धातम ही सार ।
उछलें शक्ति अनन्त जहँ, समय-समय अविकार ।।6।।
धन्य-धन्य वीतरागता, धन्य-धन्य------आप ।
धन्य-धन्य शुद्धात्मा, जामें पुण्य न पाप ।।7।।
ज्ञानमयी शुद्धात्मा, वर्ते मंगल रूप ।
निर्मोही एकाग्र हो, ध्याऊँ शुद्ध चिद्रूप ।।8।।
स्रोत: जिनवाणी भक्ति, पृष्ठ ८० से ८१