तर्ज-लखी-लखी …
शाश्वत तीर्थ अहो अंतर में, सुख स्वरूप सुखकार रे।
अन्तर्मुख हो करूँ वंदना, होऊँ भव से पार रे।।टेक।।
अहो ! तैरता हुआ विश्व के ऊपर जो शुद्धात्मा।
नित्यमुक्त निर्द्वन्द निरामय, है कारण परमात्मा।।
वंदनीय है, पूजनीय है, समयसार अविकार रे।।1।।
शुद्धातम का दर्शन-ज्ञान-चारित्र तीर्थ व्यवहार है।
पर भावों से भिन्न ज्ञानमय, साम्य भाव शिवकार है।।
स्वाश्रय से ही तीर्थ प्रगटता, नाशे बंध विकार रे।।2।।
ऐसा तीर्थ सु पाया जिनने, धन्य हुए कृतकृत्य हुए।
उन संतों के चरण पड़े जहाँ, वे भी तीर्थ पवित्र हुए।।
दर्शावें ये तीर्थ तीर्थ की, महिमा अपरम्पार रे।।3।।
उन संतों सम हो निवृत्ति, ध्याऊँ अविरल आतमराम।
साम्यभाव हो परमानंदमय, सम्यक् भावे सहज प्रणाम।।
चित्स्वरूप को ध्याते-ध्याते, लहूँ परम पद सार रे।।4।।
स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’