तर्जः जैसो गुरुवर करें उपकार …
जैसो समकित महा सुख दान, दूजो कोई नहीं ।। टेक ।।
सच्चे देव-शास्त्र-गुरु ध्यावो, हिरदै श्रद्धा और न लावो ।
जैसा जिनवाणी बतलावे, तामे शंका नेक न लावो।।
जो तप धर्म करो मन भावो, सुख तामें न चाहो बुधवान ।। 1 ।।
काय मलिन लखि गुण न चितारे, हिरदै तत्त्व कुतत्त्व विचारे।
साधर्मी के दोष छिपा रे, डिगते को तू धर्म दृढ़ारे ।।
धर्मिन देख मोद मन धारे, जिनधर्म दिपावों सु भानु ।। 2 ।।
तुम ना ज्ञान गर्व उर धारो, ना कुल, पूजा, जाति उचारो।
धन के बल को क्या पतियारो, क्या तप, देह गर्व विस्तारो ।।
ये सब गर्व समझ परिहारें, यासों समकित होत अम्लान ।। 3 ।।
कुगुरु-कुदेव-कुवृष न ध्यावो, इनके सेवक को न सराहो।
छह अनायतन दूर हटाओ, ना गुरु लोक मूढ़ता ध्यावो ।।
देव मूढ़ता दूर भगावो, तब ही धारो सो समकित भान ।। 4 ।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ३० से ३१
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’