सुख का है यही उपाय मात्र | sukha ka hai yahi upaya matra

सुख का है यही उपाय मात्र।

नहिं पर का करो, ना निज का करो ॥ टेक ॥
हैं तेरे विकल्प निरर्थक ही,
चलते पटिये में हाथ न दो।
निज ज्ञाता रूप लखो चेतन,
कर्तृत्व रहित आनन्दित हो॥ 1 ॥

आत्मा नहीं होय पराया कभी,
पर द्रव्य कभी अपना नहीं हो।
कर भेद-विज्ञान अहो’ आत्मन्’
तुम स्वयं-स्वयं में तृप्त रहो ॥ 2 ॥

जब ज्ञायक हूँ अनुभव होवे,
तब दुर्विकल्प उत्पन्न न हो।
नहीं इष्ट-अनिष्ट दिखे कोई,
हो सकल विश्व ही ज्ञेय अहो ॥ 3 ॥

निर्भेद अखेद अखण्ड प्रतापी,
वैभवमय
शुद्धात्म
प्रभो !
बस ध्यान का ध्येय रहे अविरल,
परमातम दशा तब सहजहिं हो ॥ 4 ॥

अब नहीं कामना किंचित् भी,
उपयोग स्वयं में ही थिर हो।
निर्द्वन्द्व स्वयं में तृप्ति मयी,
प्रभु ! कालावली अनन्त सु हो ॥ 5 ॥


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ३४९ से ३५०
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’