संबोधन | Sambodhan

संबोधन !

(तर्ज: तिहारे ध्यान की मूरत…)

बहुत घूमे जगत् में हम, न सुख किंचित् भी पाया है।
जहाँ की सुख की आशा, वहाँ भी दुःख ही पाया है।। 1 ।।

कभी फिर भी विचारा ना, कहाँ गलती हमारी है।
हो गये मग्न दुःख में ही, दुःख की ही तैयारी है।। 2 ।।

भूल वह शास्त्र बतलाते, कि जिससे दुःख उठाया है।
हमारी मान्यता उल्टी ने, दर-दर पै फिराया है।। 3।।

हलाहल विष को पीते हैं, चाहते अमर होना है।
परन्तु विष को पीने से, मात्र बस प्राण खोना है।। 4।।

ठीक यह हाल हमारा, पुण्य में धर्म माना है।
जीव अस्तित्व को भूले, देह ही जीव माना है।। 5।।

देह की क्रिया स्व मानी, किया नहिं भेद-विज्ञाना।
भूल तत्त्वार्थ को बैठे, धर्म का मर्म नहिं जाना।। 6।।

पुण्य अरु पाप दोनों ही, एक आश्रव के बेटे हैं।
दोनों ही बंध के कारण, मोक्ष से दूर करते हैं।। 7।।

आत्म-अवलम्ब लेने से, कर्म रुकते व झड़ते हैं।
शुद्ध भावों से मुक्ति हो, दुःख सब दूर होते हैं।। ८।।

परन्तु उल्टा माना है, पुण्य से मोक्ष होता है।
पुण्य ही धर्म है निश्चय, न आगे कुछ भी होता है।। 9।।

विचारो शान्त चित होकर, जो बेड़ी बन्ध का कारण।
उसे मजबूत करने से, हो कैसे भव का निवारण।। 10।।

अरे चेतन ! कहाँ भटके, तत्त्व अभ्यास चित लाओ।
सत्य तत्त्वार्थ की श्रद्धा, विरागी भाव जगाओ।। 11।।

बीज जब आम का बोओ, तभी तो आम पाओगे।
वृक्ष बबूल लगाकर, व्यर्थ काँटे चुभाओगे।। 12।।

अगर सुख चाहते हो, तुम व्यर्थ मत काल गँवाओ।
छोड़कर मान्यता उल्टी, मुमुक्षु पंक्ति में आओ।। 13।।

पंक्ति में लगने से ‘आत्मन्’ अवश्य ही बारी आवेगी।
अन्यथा रत्न सम दुर्लभ, मनुष्य पर्याय जायेगी।।14।।

पुनः मिलना भी दुर्लभ है, अतः चेतो अरे चेतो।
करो अब भेद-विज्ञान, स्व-पर को भिन्न तुम देखो।। 15।।

एक ही मार्ग है सुख का, मूल भी सम्यक् दर्शन है।
बिना इसके हुए आत्मन्, व्यर्थ ये सर्व जप-तप हैं।। 16।।

यही वाणी प्रभु की है, इसी पर श्रद्धा तुम लाओ।
तोड़कर सर्व विकल्प, सिद्धपद अपना तुम पाओ।। 17।।


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ४०३ से ४०८
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’

1 Like