ज्ञायक ज्ञायक लखते लखते, बीते काल अनन्त रे।
ज्ञायक ही परमेश्वर मेरा, ज्ञायक ही मम संत रे ।। टेक ।।
ज्ञायक ही जीवन धन मेरा, ज्ञायक मय मम प्राण है।
ज्ञायकमय ही मुक्ति मेरी,ज्ञायकमय कल्याण है ।।
भेद विकल्पों का नहीं अवसर, बस अभेद विलसंत रे।।1।।
ज्ञायक में कुछ हुआ न होता, और नहीं कुछ होवेगा।
आनन्दमय परिपूर्ण तत्त्व है, आनन्द-आनन्द बरसेगा।।
एक रूप ध्रुव ज्ञायक प्रभु मैं हुआ आज निश्चिंत रे।।2।।
ज्ञायक तो बस ज्ञायक ही है, ज्ञायक ज्ञायक ज्ञायक है।
अखिल विश्व में नहीं दूसरा, आश्रय लायक ज्ञायक है।।
परमदेव चिच्चिन्तामणि, महिमा को मिले न अंत रे ।।3 ।।
सहजानन्दमय परमानन्दमय, अहो अतिन्द्रिय आनन्दमय।
चिदानंदमय, निजानंदमय, आनंदमय बस आनंदमय ।।
निराबाध आनंद सरोवर, अहो आज प्रगटन्त रे ।।4 ।।
स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’