शाश्वत प्रभुता है चैतन्य धाम में।
विलसो रे विलसो आत्माराम में ।। टेक ।।
(दोहा) - आत्मा ध्रुव परमात्मा, ज्ञानानंद का धाम।
अन्तर्मुख हो अनुभवो, सहज मिले विश्राम ।।। ।।
सहज स्वयं में प्राप्त है, जो तू देखे जीव।
स्वतः पूर्ण शुद्धात्मा, तामेँ बसो सदीव । ।2 ।।
पर की आशा छोड़ तू, कर निज का विश्वास ।
जब तू अपने पास हो, मुक्ति हो तेरे पास । ।३ ।।
ज्ञान ज्योति नित जगमगे, चित्प्रकाश विलसाय ।
अनुपम चैतन्य महल में, सुख सागर लहराय । ।4 ।।
स्वयं सिद्ध तेरा अहो, अक्षय गुण भंडार ।
ध्रुव मंगल शुद्धात्मा, जानो जग में सार।।5।।
स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’