शुद्ध वस्त्र तन पर धारण कर,
जिनमंदिर की और चला।
प्रभु प्रक्षाल किया घिस-घिस कर,
पर निज मन नहीं चमक सका ।। टेक।।
मंगल पाठ पढ़ लिए सस्वर,
पर निज मन का भाव न जागा।
चरणोदक ले लिया किन्तु नहीं,
प्रभु चरणों में चित अनुरागा।। 1।।
अष्ट द्रव्य का थाल सजाना,
कोई मुश्किल काम नहीं है।
घिस चंदन का तिलक लगाना,
कष्ट साध्य का काम नहीं है।। 2।।
पुष्पांजलि छेप कर देना,
भाव भक्ति पहिचान नहीं है।
करतल बजा उच्च स्वर गाना,
भी प्रभु का गुणगान नहीं है।। 3।।
शान्ति पाठ पढ़ लिया किन्तु,
मन में शान्ति अप्राप्त रही।
पाठ विसर्जन किया किन्तु,
नहीं भाव निर्जरा प्राप्त हुई ।। 4।।
सामायिक कर चुके किन्तु नहिं,
हुआ समय का किंचित् भान।
बहुत किया स्वाध्याय किन्तु,
फिर भी न हुआ कुछ आतम भान।। 5।।
बिन अन्तर की ओर निहारे,
ऊपर मन से ध्यान वृथा है।
अगर भक्ति कुछ नहीं हृदय में,
तो पूजन और ध्यान वृथा है।। 6।।
षट् रस भोजन त्याग कर दिये,
त्याग दिये चऊविध आहार।
किन्तु लालसा मिटी न मन की,
तो उपवास हुआ बेकार ।। 7।।
चार संघ को दान दे दिये,
खर्चे लाख कोटि दीनार ।
किन्तु मान-यश रहा मूल में,
तो सब दान हुआ बेकार ।। 8 ।।
बिना ज्ञान और बिना भाव के,
किया हुआ श्रम दान वृथा है।
बिना विनय और बिना भाव के,
किया हुआ सम्मान वृथा है ।।9।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ३९८ से ३९९
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’