श्री वीर का शासन मंगलमय, महावीर का शासन मंगलमय ।
जिनशासन सबको सदाकाल, सर्वत्र सर्वथा मंगलमय ।। टेक ।।
आत्मानुभूति है मंगलमय, ज्ञानानुभूति है मंगलमय।
मोह-क्षोभ से रहित, सहज स्वाभाविक समता मंगलमय ।। 1 ।।
श्रद्धान-ज्ञान है मंगलमय, आचरण-ध्यान है मंगलमय।
जिन तपश्चरण है मंगलमय, जिन आराधन है मंगलमय ।। 2 ।।
जिनमुद्रा जग में मंगलमय, जिनवाणी जग में मंगलमय ।
जिन भेदज्ञान है मंगलमय, परमार्थ सहज है मंगलमय ।। 3 ।।
व्यवहार योग्य है मंगलमय, है रूप हमारा मंगलमय।
हे नाथ नमनमय सहज भावना, परिणति होवे मंगलमय ।। 4 ।।
निर्ग्रन्थ शासन मंगलमय, अप्रमत्त शासन मंगलमय ।
अनेकान्त शासन मंगलमय, जिननाथ का शासन मंगलमय ।। 5 ।।
शासन नमोस्तु है मंगलमय, सर्वज्ञ का शासन मंगलमय ।
दशलक्षण धर्म है मंगलमय, होवे प्रभावना मंगलमय ।। 6।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ३२२ से ३२३
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’