हमने अपने में ही महज़बीं देख लिया | Hamne Apne Me Hi Mehjabeen Dekh Liya

प्रूफरीडिंग बाकी है
ये बोल रिकॉर्डिंग से मशीन द्वारा लिखे गए हैं, इनमें अशुद्धियाँ हो सकती हैं।

हमने अपने में ही महज़बीं देख लिया,
अब ना परदा रहा परदे-नशीं देख लिया।

मारे फिरते थे कहीं तीरथों में सजदे किये,
हमने वह रश्क-ए-कमर आज यहीं देख लिया। ।।1।।

शत नादानी है लोगों की जो बुतों पे मरें,
हमने बुत-ज़ाद को सीने में यहीं देख लिया। ।।2।।

कौन मुश्किल है जो कहते हैं कि कैसे देखें,
आईना दिल का किया साफ़ यहीं देख लिया। ।।3।।

ऐ शिखर तू तो मसले-मसाइल का क़ायल ही रहा,
हमने करके तजरुबा आज यहीं देख लिया। ।।4।।

रचयिता : कवि शिखरचंद जी
स्वर : पण्डित श्री मांगीलाल जी, कोलारस

सुनें:

स्रोत: JinSwara ऑडियो संग्रह।


भावार्थ

यह रचना कवि शिखरचंद जी की है, जिसे पण्डित श्री मांगीलाल जी (कोलारस) ने स्वर दिया है। इसमें आत्मानुभूति, अंतर्मुखता और बाहरी खोज के बजाय अपने भीतर परम सौंदर्य को देखने की बात कही गई है।

इसकी सबसे सुंदर बात यह है कि कवि जिस परम सौंदर्य को तीर्थों में, मूर्तियों में और बाहरी साधना में खोज रहे थे, उसे अंततः अपने ही भीतर अनुभव कर लेते हैं।

आइए, एक-एक पद का भाव समझते हैं।

पद 1

हमने अपने में ही महज़बीं देख लिया,
अब ना परदा रहा परदे-नशीं देख लिया।

शब्दार्थ:

  • महज़बीं: चाँद-सा सुंदर मुख, परम सौंदर्य का प्रतीक।
  • परदे-नशीं: पर्दे में रहने वाला, जो अब तक दृष्टि से ओझल था।

भावार्थ:

कवि कहते हैं कि जिस परम सौंदर्य को मैं अब तक बाहर खोज रहा था, उसे अपने ही भीतर देख लिया। अब मेरे और उस सत्य के बीच कोई पर्दा नहीं रहा।

आध्यात्मिक दृष्टि से यह आत्मदर्शन का भाव है। जब आत्मा का वास्तविक स्वरूप अनुभव में आता है, तब बाहरी खोज समाप्त हो जाती है।

पद 2

मारे फिरते थे कहीं तीरथों में सजदे किये,
हमने वह रश्क़-ए-कमर आज यहीं देख लिया।

शब्दार्थ:

  • सजदे: श्रद्धापूर्वक सिर झुकाना, वंदना करना।
  • रश्क़-ए-कमर: चंद्रमा को भी ईर्ष्या हो, ऐसा अनुपम सौंदर्य।

भावार्थ:

कवि कहते हैं कि मैं अब तक तीर्थों में भटकता रहा, जगह-जगह सिर झुकाकर वंदना करता रहा। लेकिन आज जिस अनुपम सौंदर्य की तलाश थी, उसे यहीं, अपने भीतर पा लिया।

इसका अर्थ तीर्थों या वंदना का निषेध नहीं है। बल्कि कवि यह समझा रहे हैं कि बाहरी साधना का वास्तविक उद्देश्य भीतर के सत्य तक पहुँचना है।

पद 3

शत नादानी है लोगों की जो बुतों पे मरें,
हमने बुत-ज़ाद को सीने में यहीं देख लिया।

शब्दार्थ:

  • बुत: मूर्ति या प्रतिमा।
  • बुत-ज़ाद: बुत से जन्मा हुआ, अर्थात् मूर्ति में प्रतिष्ठित सौंदर्य या उसका मूल स्वरूप।

भावार्थ:

कवि कहते हैं कि लोग बाहरी रूपों और मूर्तियों में ही उलझे रह जाते हैं, जबकि जिस परम सौंदर्य की वे आराधना करते हैं, उसका वास्तविक अनुभव अपने हृदय में भी किया जा सकता है।

जैन दर्शन के संदर्भ में इसे इस तरह समझ सकते हैं कि जिनेंद्र भगवान की वीतरागता और शुद्ध आत्मस्वरूप को केवल बाहरी प्रतिमा तक सीमित न रखकर, अपने भीतर भी अनुभव करने का प्रयास करना चाहिए।

पद 4

कौन मुश्किल है जो कहते हैं कि कैसे देखें,
आईना दिल का किया साफ़ यहीं देख लिया।

भावार्थ:

लोग पूछते हैं कि उस परम सत्य को कैसे देखा जा सकता है? कवि कहते हैं कि इसमें कठिनाई क्या है? मैंने अपने हृदय रूपी दर्पण को स्वच्छ किया और उसी में उस सत्य का दर्शन कर लिया।

यहाँ हृदय का दर्पण हमारे भीतर के राग, द्वेष, मोह, अहंकार और विकारों से ढका हुआ है। जब ये मलिनताएँ कम होती हैं, तब आत्मा का वास्तविक स्वरूप अधिक स्पष्ट होता है।

यह पद जैन दर्शन के आत्मशुद्धि और कषायों के क्षय के भाव से विशेष रूप से जुड़ता है।

पद 5

ऐ शिखर तू तो मसले-मसाइल का क़ायल ही रहा,
हमने करके तजरुबा आज यहीं देख लिया।

शब्दार्थ:

  • मसले-मसाइल: प्रश्न, उलझनें और तर्क-वितर्क।
  • क़ायल: किसी बात को मानने वाला या तर्क से सहमत होने वाला।
  • तजरुबा: अनुभव।

भावार्थ:

कवि स्वयं को संबोधित करते हुए कहते हैं कि हे शिखर! तू अब तक प्रश्नों, तर्कों और विचारों में ही उलझा रहा। लेकिन आज मैंने स्वयं अनुभव करके उस सत्य को जान लिया।

यहाँ कवि बौद्धिक ज्ञान और आत्मानुभूति के अंतर को स्पष्ट करते हैं। किसी सत्य के बारे में पढ़ना, सुनना या तर्क करना अलग बात है; उसे स्वयं अनुभव करना बिल्कुल अलग।

पूरी रचना का सार

जिसे बाहर खोजते रहे, वह भीतर ही विराजमान था।

तीर्थों की यात्रा, वंदना, शास्त्रों का अध्ययन और तर्क-वितर्क, ये सभी साधना के माध्यम हो सकते हैं, लेकिन आत्मा के वास्तविक स्वरूप का अनुभव अंतर्मुख होने पर ही होता है।

जब हृदय का दर्पण स्वच्छ होता है, तब बाहर खोजा जाने वाला परम सौंदर्य अपने भीतर ही दिखाई देने लगता है।

जैन दर्शन से इसका गहरा संबंध

इस रचना का केंद्रीय भाव जैन दर्शन के इस सिद्धांत से जुड़ता है कि जिस शुद्ध स्वरूप की हम आराधना करते हैं, वही शुद्ध आत्मस्वभाव हमारे भीतर भी विद्यमान है।

भगवान की प्रतिमा हमें वीतरागता का स्मरण कराती है। शास्त्र हमें मार्ग दिखाते हैं। गुरु हमें दिशा देते हैं। लेकिन आत्मानुभूति की यात्रा अंततः स्वयं के भीतर ही पूरी होती है।

इसलिए इस रचना का सबसे गहरा संदेश है: बाहर की खोज से भीतर की पहचान तक का सफर ही अध्यात्म की वास्तविक यात्रा है।


यह अर्थ ChatGPT द्वारा तैयार किया गया है।

खोज: हमने अपने में ही महजबीं देख लिया, हमने अपने में ही महज़बीं देख लिया, Hamne Apne Me Hi Mehjabin Dekh Liya

1 Like