श्री पंचकल्याणक भक्ति | shri pamchakalyanaka bhakti

जय-जयकार जय-जयकार, जय-जयकार ॥ टेक ॥
गर्भ में आये श्री जिनराज, जय-जयकार करें हम आज,
पन्द्रह मास रतन बरसे थे, नगरी की रचना सुखकार।
इन्द्रादिक देवों ने आकर, उत्सव कीना मंगलकार ॥ 1 ॥

अन्तिम जन्म हुआ जिनराज, जय-जयकार करें हम आज,
नरकों में भी क्षण भर को, तब साता का संचार हुआ।
जन्म महोत्सव इन्द्रों द्वारा, प्रभुवर का सुखकार हुआ ॥ 2 ॥

दीक्षा लीनी श्री जिनराज, जय-जयकार करें हम आज,
बारह भावना प्रभु ने भायीं, सहज प्रबल वैराग्य हुआ।
अनुमोदन लौकान्तिक कीना, आनंद अपरम्पार हुआ ॥ ३॥

केवलज्ञान हुआ जिनराज, जय-जयकार करें हम आज,
अद्भुत रचना समवशरण की, दिव्यध्वनि प्रभु मंगलकार।
धर्मतीर्थ का हुआ प्रवर्तन, अहो ! अहो ! अद्भुत उपकार ॥ 4 ॥

मोक्ष पधारे श्री जिनराज, जय-जयकार करें हम आज,
निर्मल आतम ध्यान लगाया, कर्म कलंक नशाया था।
ध्रुव अनुपम शिव पदवी पायी, आवागमन मिटाया था॥ 5॥


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ३१७ से ३१८
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’