शुद्ध चैतन्य भाव अनुभवते, नय पक्षों के साक्षी हैं।
ज्यों सर्वज्ञ प्रभु साक्षी हैं, ज्ञानी भी त्यों साक्षी हैं।।
सहज भाव से साक्षी हैं, वे अखिल विश्व के साक्षी हैं ।। टेक ।।
स्वयं-स्वयं में तृप्त सहज ही, अक्षय प्रभुता प्रगट हुई ।
पर के प्रति उत्साह न किंचित्, पर द्रव्यों के साक्षी हैं ।। 1 ।।
द्रव्यदृष्टि प्रगटी अन्तर में, निर्विकल्प कृतकृत्य हुए।
नहीं प्रयोजन शेष रहा कुछ, द्रव्य-पर्यय के साक्षी हैं।। 2 ।।
कर्मोंदय चाहे जैसा हो, कैसी भी हो देह-दशा।
हों संयोग भले ही कैसे, ज्ञानी रहते साक्षी हैं।। 3।।
मिथ्या अंहकार सब छूटा, कर्त्ता बुद्धि दूर हुई।
चाहे जैसा जगत परिणमे, ज्ञानी रहते साक्षी हैं।। 4।।
कोई निंदे, कोई प्रशंसे, कोई आवे या जावे।
हों उपसर्ग भंयकर चाहे, ज्ञानी रहते साक्षी हैं।। 5।।
साक्षी अथवा ज्ञाता दृष्टा, निर्मोही रागादि रहित।
शांत सहज निर्मुक्त अहो ! वे बंध मोक्ष के साक्षी हैं।। 6 ।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’