सिद्धचक्र को पाठ रचाया, आनंद छाया है।
नहीं कामना भक्तिवश ही पाठ रचाया है ।। टेक ।।
जब से प्रभुवर तुमको देखा, निज प्रभुता का भान हुआ।
स्वयं पूर्ण ज्ञाता स्वरूप, आनंदरूप श्रद्धान हुआ।।
अहो ! परम उपकार, मुक्ति का मार्ग दिखाया है।।1।।
प्रभु ! निज में हूँ तृप्त सदा ही, निज में ही संतुष्ट सदा।
निज में ही रम जावे परिणति, निज से च्युत होवे न कदा ।।
सकल जगत् में केवल, ज्ञायक रूप सुहाया है।।2।।
हो विभुवर ! आदर्श हमारे, तेरा पथ अनुसरण करूँ।
हो निर्ग्रन्थ आत्मपद साधूँ, निश्चय शिवपद प्राप्त करूँ ।।
जग की कुछ परवाह नहीं, पुरुषार्थ जगाया है।।3।।
स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’
स्रोत: जिन-भक्ति सिंधु, पृष्ठ २७७ से २७८