अर्थ:- हे जिनेन्द्र देव ! मेरी ऐसी बुद्धि हो जिससे मैं राग-द्वेषरूपी अग्नि से बचकर समतारूपी रस में भीज जाऊँ।
स्व से परे को पर हैं , अन्य हैं उसको छोड़कर मैं अपनी आत्मा में ही रमण करूँ और वह आदत-लाग मेरी कभी भी न छूटे, मेरी ऐसी बुद्धि हो ।
कर्म और उसके फल की ओर मेरी कभी रुचि न हो और मैं सदैव ज्ञानरूपी अमृत का पान करता रहूँ अर्थात् अपने ज्ञानस्वरूप में सदा लीन रहूँ , मेरी ऐसी बुद्धि हो ।
निज रूप की , स्वरूप की पहचान के लिए मुझे सम्यक् दर्शन, सम्यक्ज्ञान व सम्यक्चारित्र की प्राप्ति हो । इसके लिए आप ही श्रेष्ठ कारण हो ; साधन हो अर्थात् आपका गुण चिंतवन मुझे अपने गुणों की प्रतीति कराता रहे । दौलतराम जी कहते हैं कि यह ही उनकी विनती है ,अरज है , उसे स्वीकार कीजिए ।