त्रिभुवन स्वामी चेतननामी, काहे बनो दिलगीर
त्रिभुवन स्वामी चेतननामी, काहे बनो दिलगीर ।
प्रभुता अपनी आज निहारो, कटे कर्म जंजीर ।।टेक।।
जग को अपना-अपना कहता, व्यर्थ मोह से दुखड़ा सहता ।
करो भेद-विज्ञान भव्यजन, पहुँचो शिवपुर तीर ।।1।।
ज्यों मकड़ी खुद जाला बुनती, उसमें खुद ही फँसती मरती ।
त्यों तू निज को भूल स्वयं ही व्यर्थ बहावे नीर ।।2।।
सकल विश्व को पर ही जानो, पर से भिन्न स्व को पहिचानो ।
निज स्वभाव की महिमा लाओ, परमवीर गम्भीर ।।3।।
अपना अंश न पर में मिलाओ, पर का अंश न निज में मिलाओ ।
नव तत्त्वों से भिन्न अनुभवो, यही मुक्ति तदवीर ।।4।।
ज्ञान मात्र ध्रुव धाम सुहाना, बाहर कहीं न आना जाना ।
बनो सहज कृतकृत्य, जगत् के ज्ञाता-दृष्टा वीर ।।5।।
स्रोत: जिनवाणी भक्ति, पृष्ठ ८५