सबको एक ही धरम सहाय
सबको एक ही धरम सहाय ॥टेक॥
सुर नर नारक तिरयक् गति में, पाप महा दुखदाय ॥
गज हरि दह अहि रण गद वारिधि, भूपति भीर पलाय ।
विधन उलटि आनन्द प्रगट ह्वै, दुलभ सुलभ ठहराय ॥
सबको एक ही धरम सहाय ॥१॥
शुभतैं दूर बसत ढिग आवै, अघतैं करतैं जाय ।
दुखिया धर्म करत दुख नासै, सुखिया सुख अधिकाय ॥२॥
सबको एक ही धरम सहाय ॥२॥
ताड़न तापन छेदन कसना, कनक परीच्छा भाय ।
‘द्यानत’ देव धरम गुरु आगम, परखि गहो मनलाय ॥३॥
सबको एक ही धरम सहाय ॥३॥
Artist: पं. द्यानतराय जी
स्रोत: nikkyjain.github.io (पं द्यानतराय कृत भजन)
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