हे तीन लोक की मात
(तर्ज - सुरपति ले अपने शीष, जगत् के ईश…)
हे तीन लोक की मात, जगत् सिर नात,
सुनें भवि प्राणी, जय जय हो माँ जिनवाणी ।।
गणधर मुनि जिसको सिर नायें, ज्ञानी जिसकी महिमा गायें ।
वह हृदयंगम हो, अविनाशी सुखदानी ।।1।। जय जय…
भगवत स्वरूप मम दर्शाती, पर्याय दोष सब विनशाती ।
परिपूर्ण तत्त्व मैं, ध्रुवता अपनी मानी ।।2।। जय जय…
अब तक भव-भव की भटकन में, शुभ-अशुभ राग की अटकन में ।
है वीतरागमय धर्म, तुम्हीं बखानी ।।3।। जय जय…
कर्तापन का भ्रम मिटा दिया, मैं ज्ञाता दृष्टा बता दिया ।
वस्तु स्वतंत्रता, भविजन तुमसे जानी ।।4।। जय जय…
स्रोत: मङ्गल भक्ति सुमन (२०२४), पृष्ठ ८३