हमको कैसे शिवसुख होई। Humko kaise ShivSukh Hoi

हमको कैसैं शिवसुख होई ॥टेक॥
जे जे मुकत जान के कारण, तिनमें को नहि कोई ॥

मुनिवर को हम दान न दीना, नहिं पूज्यो जिनराई ।
पंच परम पद बन्दे नाहीं, तपविधि वन नहिं आई ॥ हमको कैसैं शिवसुख होई ॥१॥

आरत रुद्र कुध्यान न त्यागे, धरम शुकल नहिं ध्याई ।
आसन मार करी आसा दिढ़, ऐसे काम कमाई ॥ हमको कैसैं शिवसुख होई ॥२॥

विषय-कषाय विनाश न हूआ, मनको काबु न कीना ।
मन वच काय जोग थिर करकैं, आतमतत्त्व न चीना ॥ हमको कैसैं शिवसुख होई ॥३॥

मुनि श्रावकको धरम न धार्यो, समता मन नहिं आनी ।
शुभ करनी करि फल अभिलाष्यो, ममता-बुध अधिकानी ॥ हमको कैसैं शिवसुख होई ॥४॥

रामा रामा धन धन कारन, पाप अनेक उपायो ।
तब हू तिसना भई न पूरन, जिनवानी यों गायो ॥ हमको कैसैं शिवसुख होई ॥५॥

राग दोष परनाम न जीते, करुना मन नहिं आई ।
झूठ अदत्त कुशील गह्यो दिढ़, परिगृहसों लौ लाई ॥ हमको कैसैं शिवसुख होई ॥६॥

सातौं विसन गहे मद धार्यो, सुपरभेद नहिं पाई ।
‘द्यानत’ जिनमारग जाने बिन, काल अनन्त गमाई ॥ हमको कैसैं शिवसुख होई ॥७॥

अर्थ : हे आत्मन् ! हमको मोक्षसुख की प्राप्ति कैसे हो? क्योंकि जो-जो भी मुक्ति के कारण कहे जाते हैं उनमें से तो एक भी हममें नहीं है।

हमने कभी मुनियों को दान नहीं दिया अर्थात् आहारदान नहीं दिया। न श्री जिनराज की पूजा की। पंचपरमेष्ठियों की कभी वन्दना नहीं की और न कोई तप-साधना ही हमसे बन पड़ी।

आर्त-रौद्र कुध्यान हैं, इनको भी हमने कभी नहीं छोड़ा। हमने कभी धर्म व शुक्ल ध्यान नहीं साधा। आसन लगा कर अर्थात् हमने अपने सब प्रकार के प्रयत्नों-क्रियाओं से अपनी आशाओं को ही दृढ़ किया, निदान व तृष्णा में ही लगे रहे-कुशील में लगे रहे।

इन्द्रिय विषय और कषाय का विनाश नहीं किया और मन को स्थिर नहीं किया, वह चंचल ही बना रहा। मन-वचन और काय को स्थिर न कर कभी अपनी आत्मा की ओर नहीं देखा अर्थात् आत्म तत्त्व को नहीं जाना।

न मुनि धर्म साधा और न श्रावक धर्म का पालन किया। मन में समता नहीं रही, राग-द्वेष में ही रत रहा। पुण्य कार्य के परिणाम की अभिलाषा-इच्छा ही करता रहा और रागभाव में ही डूबा रहा।

स्त्री व धन के कारण अनेक पाप कर्म किए। फिर भी तृष्णा शान्त नहीं हुई, तृप्त नहीं हुई।

राग-द्वेष और उसके फल, इन पर विजय प्राप्त नहीं की और न कभी करुणा मन में आई। झूठ, चोरी, कुशील की क्रियाओं में ही लगा रहा और परिग्रह जुटाता रहा, उसी में लगा रहा।

सप्त व्यसनों में मैं लिप्त रहा; उसी के नशे में मैं डूबा रहा, स्व-पर का भेद नहीं जाना। द्यानतराय जी कहते हैं कि जिन-मार्ग को, धर्म को जाने बिना अनन्त काल बिता दिए, गँवा दिए, ऐसे में शिवसुख कैसे हो?

रचयिता: पंडित श्री द्यानतराय जी
सोर्स: द्यानत भजन सौरभ

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