श्री अक्षय तृतीया भक्ति | shri akshaya trritiya bhakti

अक्षय तृतीया पर्व महान्, सीखें हम सब देना दान।
दान परम सुखदायक जान, हर्ष सहित हम देवें दान ॥ टेक ॥
आतम अनुभव निश्चय दान, इससे जीव बने भगवान्।
पात्र-दान व्यवहार सुजान, आत्म-विशुद्धि होय महान् ॥
नित प्रभावना हो अम्लान ॥ 1 ॥

श्रद्धा, भक्ति, तुष्टि, विज्ञान, क्षमा, अमात्सर्य, शक्ति पिछान ।
दाता के सम्यक् गुण जान, इनसे सहित पात्र पहिचान ॥
देवें सदा चतुर्विध दान ॥ 2 ॥

अरे ! कमाना और जोड़ना, खाना-सोना चाहे तोड़ना।
हर्ष-विषाद इन्हीं में करना, लोभ-मान अंतर में धरना ॥
ये तो हैं पशुवत् सब काम ॥3॥

हो मनुष्य तुम करो विवेक, ध्याओ निज शुद्धातम एक।
मुक्तिमार्ग में आगे बढ़ना, रत्नत्रय की सीढ़ी चढ़ना ॥
इससे ही होवे कल्याण ॥4॥

श्रमणोपासक श्रावक होते, स्वयं साधु होवे सब दुख खोवे ।
निज स्वभाव में रमता जावे, अविरल कर्म नशाता जावे ॥
पावे सिद्ध दशा अम्लान ॥ 5 ॥

वज्रजंघ के भव में सार, भक्ति से मुनि को आहार।
दिया हुए गहरे संस्कार, ऋषभ मुनि को दिया आहार ॥
पंचाश्चर्य हुए सुखदान ॥ 6 ॥

हुआ सभी को हर्ष अपार, दान तीर्थ वर्ता अविकार।
धर्म-तीर्थ का जो आधार, गूँजा जग में जय-जय कार ॥
हम भी गावें प्रभु गुणगान ॥7॥


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ३०४ से ३०५
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’