परिग्रह सों सदा काल रूप मम न्यारो रहे,
ऐसो जान ज्ञानी इह लोक भय नशायो है ।। 1 ।।
ज्ञान-लोक आत्मीक, शेष सब पौद्गलिक,
यातें परलोक चिंता ने नहीं सतायो है।। 2।।
जड़ द्रव्य प्राणों को बिछुड़ते हू देख निज,
भाव प्राण साथ जान मौत भय भगायो है ।। 3 ।।
जेते रोग तेते तन माँहि, नहिं मुझ माँहि,
रोग भय ऐसे चिंतवे ते नहिं आयो है।। 4।।
मैं हूँ जीव द्रव्य अतः सत्ता है त्रिकाल मेरी,
ऐसे जान अनरक्षा भय नहीं मान्यो है।। 5।।
ज्ञान सम्पदा को नहिं लूटि सके अन्य कोई,
अतः अनगुप्ति डर किंचित् न आन्यो है ।। 6।।
आत्म स्वभाव रहे एक रूप सदाकाल,
परिणाम भी तो क्रमबद्ध रूप जान्यो है।। 7।।
अतएव अकस्मात् भय से रहित होय,
ज्ञानी तो सदैव निज रूप माँहि राँचो है।। 8 ।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ३३० से ३३१
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’