तर्जः निरखत जिनचन्द्र …
शान्तिनाथ-शान्तिनाथ, जयवन्तो शान्तिनाथ ।
चित्त मेरा शान्त हुआ, दर्श करके शान्तिनाथ।। टेक।।
वीतराग-सर्वज्ञ-हितोपदेशी
लोकनाथ ।
धर्म तीर्थ के प्रणेता, साँचे देव शान्तिनाथ ।। 1।।
मंगलमय शान्तिनाथ, लोकोत्तम शान्तिनाथ ।
भव्यों को उत्कृष्ट, शरणभूत
शान्तिनाथ।। 2।।
तुमको बिन जाने भव-भव में रुले हो अनाथ।
आज आपके समीप, जाना चैतन्यनाथ।। 3।।
नित्य रूप चित्स्वरूप, परमशान्त निज स्वरूप।
अनुभव प्रत्यक्ष हुआ, देव हम हुए सनाथ।। 4।।
बहुमान पूरित हो, भक्ति करूँ शान्तिनाथ ।
पुरूषार्थ ऐसा हो, आप जैसा होऊँ नाथ ।। 5 ।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ९६ से ९७
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’