तर्ज : सब मिलकर आज जय कहो …
श्री वीर जयन्ती को सब मिल के मनाएँ।
महावीर का संदेश हम जग भर को सुनाएँ।। टेक ।।
छह द्रव्य श्री वीर ने इस जग में बताए।
सुख प्राप्ति हेतु हमको सात तत्त्व सिखाए ।।
तत्त्वों का ज्ञान करके कर्म-फन्द छुड़ाए।। 1।।
आत्मा सभी समान जैसा कर्म जो करता।
वैसा ही शुभाशुभ फल वह स्वयं भरता।।
अतएव दुश्मन से भी हम द्वेष मिटाएँ।। 2।।
हिंसा सदैव अहिंसा से हारती आई ।
सदा ही लोहा गर्म कटता ठंडे से भाई ।।
हम शान्तिमय भावों से विकारों पर जय पाएँ।। 3।।
संसार के भोगों में आकुलता ही भरी है।
इनमें न किसी को भी अब तक शान्ति मिली है ।।
दुःखों के कारण भोगों का हम त्याग कराएँ।। 4।।
दुःख में न छोड़ें धैर्य, सुख में भी नहीं फूलें।
सदैव समता भाव हिंडोले में हम झूलें ।।
खुद जियो और जीने दो का भाव जगाएँ।। 5।।
कोई किसी को सुख-दुख का नहीं दाता।
पर को यह देकर दोष व्यर्थ दुःख ही पाता।।
अतएव सम्यक् निज-पर भेदज्ञान कराएँ।। 6।।
दुःखों के कारण अज्ञान मिथ्यात्व राग मोह।
हास्यादिक नो कषाय माया लोभ मान क्रोध ।।
हम इनका नाश करके वीर से ही बन जाएँ।। 7।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ३१९ से ३२०
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’