सुनो जिनवाणी प्रभु की वाणी
निशि भोजन का त्याग करो रे ऽऽऽ
निशि भोजन का त्याग करो और पियो छानकर पानी ॥ टेक ॥
तीन लोक में जीव हैं जितने, दुख से डरे सुख चाहें,
परिग्रह से सुख मिले न जब तक जिन गंगा अवगाहें।
भोगों में सुख नहीं प्रभु ने सच्ची बात बताई
इस संसार में सुख की इच्छा रखना ही दुखदाई
सच्चा सुख मिलता है तब ही ऽऽऽ
सच्चा सुख मिलता है तब जब नर हो आतम ज्ञानी ॥
सुनो जिनवाणी… ।॥1 ॥
हिंसा झूठ चोरी कुशील और परिग्रह,
ये हैं पाँच पाप इन्हें मन से निकारो जी,
पंचेन्द्रिय के कहे में न आये पंच परमेष्ठी,
भले पंच महाव्रत धारो जी,
क्रोध मान माया लोभ चार ये कषाय भारी
इनको सजोय चार गति में सुधारो जी
एकनिष्ठ होके एक पथ पे गमन करो
एक जिनवाणी को कभी न विसारो जी
श्री जिनवर की वाणी जग में ऽऽऽ
श्री जिनवर की वाणी जग में एक मात्र कल्याणी
सुनो जिनवाणी… ॥2॥
दीन दुखी पर करुणा पाले सबसे प्यार करो रे
सबका सुख दुख एक है सबसे सम व्यवहार करो रे
सत्य अहिंसा धर्म निभाओ बनकर शाकाहारी
खान पान पर निर्भर करती मन और बुद्धि तुम्हारी
सुख से सुखी और दुख से दुखी है ऽऽऽ
सुख से सुखी और दुख से दुखी है दुनिया का हर प्राणी
सुनो जिनवाणी… ।॥3 ॥
जा वाणी के ज्ञान ते सूझे लोकालोक।
सो वाणी मस्तक नमो सदा देत हूँ ढोक ।
सुनो जिनवाणी… ।।4 ।।
स्रोत: मङ्गल भक्ति सुमन (२०२२), पृष्ठ ८० से ८१