तर्ज : तुमसे लागी लगन…
ज्ञानी आत्मा ही निज रूप धारे, भेद-विज्ञान ऐसे विचारे।
मैं तो चेतन प्रभु ये अचेतन सभी घर और द्वारे ।।
व्यर्थ कहता हूँ महल हमारे ।। टेक ।।
मात-पित-सुत-कुटुम्बी संगाती, मात्र मतलब के सब ही हैं साथी।
स्वार्थ वश निज कहें अंत मुझको तजें, होवें न्यारे ।।
झूठ कहना कुटुम्बी हमारे।। 1।।
वैश्या सम होती लक्ष्मी है चंचल, इसके मिलने से होते न मंगल।
मुझको अंधा करे और दुःख में धरे, सुख उजाड़े।।
वस्त्र-भूषण भी ना हैं हमारे।। 2।।
रूपी काया जो बाहर दिखाती, आत्म रूप से मेल न खाती ।
क्षेत्र निज में रहे, कार्य निज ही करे, गुण हैं न्यारे ।।
मिथ्या नो-कर्म माने हमारे।। 3।।
औदारिक में है कान्ति जो आयी, तैजस कर्म के निमित्त पाई ।
आत्म अंश नहीं, मेरा वंश नहीं, पुद्गल सारे ।।
कैसे तैजस को अपना उचारे ।। 4।।
अष्ट कर्म रूप कार्माण शरीरा, भिन्न उसको भी तू सोच धीर।
पुद्गल निर्मित है वह, घटता-बढ़ता है वह, अन्तर धारे ।।
व्यर्थ निज मानूँ ये कर्म सारे ।। 5 ।।
राग-द्वेष हैं मेरी अवस्था फिर भी भिन्न है उसकी व्यवस्था।
पर के लक्ष्य से हों कारण दुःख के अहो सुख तू धारे ।।
भावकर्म को निज क्यों उचारे ।। 6 ।।
केवलज्ञानादि शुद्ध भाव जो हैं, आत्म लक्ष्य से निश्चय वे हों।
शुद्ध तो हैं सही, लक्ष्य योग्य नहीं, व्ययता धारे।।
शुद्ध परिणति को भी क्यों निहारे ।। 7 ।।
दर्श-ज्ञानादि गुण आत्म-धारे, भेद दृष्टि के कथन हैं सारे।
गौण सबको करे, द्रव्यदृष्टि धरे, ध्रुव चितारे ।।
सच्चा सुख तब ही प्रकटेगा प्यारे ।। 8 ।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’