हे हितवांछक प्रानी रे, कर यह रीति सयानी
हे हितवांछक प्रानी रे, कर यह रीति सयानी ।।टेक।।
श्रीजिनचरन चितार धार गुन, परम विराग विज्ञानी ।।
हरन भयामय स्वपरदयामय, सरधौ वृष सुखदानी ।
दुविध उपाधि बाध शिवसाधक, सुगुरु भजौ गुणथानी ।।१।।
मोह-तिमिर-हर मिहर भजो श्रुत, स्यात्पद जास निशानी ।
सप्ततत्त्व नव अर्थ विचारह, जो वरनै जिनवानी ।।२।।
निज पर भिन्न पिछान मान पुनि, होहु आप सरधानी ।
जो इनको विशेष जानन सो, ज्ञायकता मुनि मानी ।।३।।
फिर व्रत समिति गुपति सजि अरु तजि, प्रवृति शुभास्रवदानी ।
शुद्ध स्वरूपाचरन लीन है, ‘दौल’ वरौ शिवरानी ।।४।।
Artist: कविवर श्री दौलत राम जी
स्रोत: दौलत भजन सौरभ, पृष्ठ १६९
अर्थ
हे अपना हित चाहनेवाले, तू इस रीति का पालन कर श्री जिनेन्द्र के चरणों का चिंतवन कर और उनके गुणों को धारण कर - यह ही श्रेष्ठ व युक्तियुक्त रीति है।
हरन भयामय स्वपरदद्यामय, सरधौ वृष सुखदानी।
भयरूपी रोग को दूर करनेवाले, स्व और अन्य पर दया करनेवाले, सुख को देनेवाले धर्म पर श्रद्धान कर। हे मोक्ष के साधक, पाप और पुण्य दोनों ही मोक्षमार्ग में बाधक हैं। वे सत्गुरु ही गुण के भण्डार हैं, स्थान हैं, उनका ही भजन कर।
मोह-तिमिर-हर मिहर भजो श्रुत, स्यात्पद जास निशानी।
मोहरूपी अंधकार को हरनेवाले उस शास्त्ररूपी सूर्य का भजन कर जिसका चिह्न स्याद्वाद शैली है। सात तत्त्व और नव पदार्थ, जिनका श्री जिनवानी में वर्णन है, का चिंतवन करो।
निज पर भिन्न पिछान मान पुनि, होहु आप सरधानी।
स्व और पर दोनों को अलग-अलग पहचानकर फिर अपने स्वरूप का श्रद्धान करो। जो इनका विशेष ज्ञान प्राप्त करते हैं उनकी ज्ञायकता को मुनिजन मानते हैं।
तत्पश्चात् व्रत, समिति, गुप्ति से अपने आपको सजाकर शुभास्त्रव की क्रियाएँ भी छोड़ दो। दौलतराम कहते हैं कि अपने शुद्धस्वरूप चिंतन में लीन होकर मोक्षरूपी लक्ष्मी का वरण करो, संसार से मुक्त हो जावो।
स्रोत: दौलत भजन सौरभ।
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