शिवमगदरसावन रावरो दरस
शिवमगदरसावन रावरो दरस ।।टेक।।
परमपद-चाह-दाह-गद-नाशन, तुम बचभेषज-पान सरस ।।१।।
गुणचिंतवत निज अनुभव प्रगटै, विघटै विधिठग दुविध तरस ।।२।।
‘दौल’ अवाची संपति सांची, पाय रहै थिर राच सरस ।।३।।
रावरो - आपका
Artist: कविवर श्री दौलत राम जी
स्रोत: दौलत भजन सौरभ, पृष्ठ २४
अर्थ
हे भगवन् ! आपके दर्शन - मोक्षमार्ग-प्रकाशक हैं, मोक्ष का मार्ग दिखानेवाले हैं।
पुद्गल की चाहरूपी दाह का, विष का, रोग का नाश करनेवाले आपके सुवचन - परम औषधिरूप हैं जिनका सेवन, चिन्तन, मनन, अनुगमन सरस है, रस से भरा हुआ है।
आपके गुण-चिंतवन से निज के गुणों का भान होता है, हममें भी वे गुण प्रकट होते हैं और पाप-पुण्यरूपी कर्म-ठग तरस कर भाग जाते हैं।
दौलतराम कहते हैं कि अव्यक्त, अकथ व अवर्णनीय जिसका कथन नहीं किया जा सकता ऐसी आत्मगुणों की संपत्ति को पाकर उसमें स्थिर हो जाओ अर्थात् अपने निज स्वरूप में मगन हो जाओ, जो रस से भरपूर है।
शब्दार्थ: शवरो - आपका
स्रोत: दौलत भजन सौरभ।
मूल पृष्ठ (छवि):
प्रूफरीडिंग बाकी है