ज्ञान की ज्योति जलाते चलो | Gyan ki jyoti jalate chlo

ज्ञान की ज्योति जलाते चलो, निज अन्तर कि वीणा बजाते चलो। टेक॥

जीवन तो आना-जाना, इसका नहीं ठिकाना।
कल क्या होगा समय धुरी पे, ये तो किसने जाना;
अपने मन को, जगाते चलो। निज अन्तर ॥१॥

जीवन अच्छे से जीने का नाम है ईश्वर पूजा
सत्य अहिंसा प्रेम से बढ़के नहीं धर्म है दूजा;
इसको सीखोऽऽऽ सिखाते चलो। निज अन्तर ॥२॥

खुद जीयो जीने दो सबको, यही धर्म का नारा,
साम्यभाव और विश्व शान्ति का फैलाओ उजियारा;
गीत धर्म के ही गाते चलो। निज अन्तर ॥३॥

काम क्रोध, मद, राग-द्वेष की जंजीरों को तोड़ो,
यही देशना है सन्तों की बुरी आदतें छोड़ो;
अपना जीवनऽऽऽ फूल खिलाते चलो । निज अन्तर ॥५॥