हे कुन्दकुन्द शिवचारी गुरुवर । He Kundkund Shivchari Guruvar

guru

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हे कुन्दकुन्द शिवचारी गुरुवर, लाखों प्रणाम।
हे कुंदकुंद अविकारी गुरुवर, लाखों प्रणाम ।।टेक।।

प्रशम मूर्ति निर्ग्रन्थ दिगंबर, लेश नहीं जिनके आडंबर।
प्रचुर स्वसंवेदनमय जीवन, लाखों प्रणाम…।।1।।

समयसार रचना नमामि, शुद्धातम दातार नमामि।
मूल संघ के नायक गुरुवर, लाखों प्रणाम…।।2।।

विषय कषायारंभ नहीं है, ज्ञान ध्यान लवलीन सही हैं।
भव का अंत सुझावें गुरुवर, लाखों प्रणाम…।।3।।

है व्यवहार का पक्ष अनादि से, नहीं स्वभाव का लक्ष्य अनादि से।
पक्षातिक्रांत दिखाते गुरुवर, लाखों प्रणाम…।।4।।

जैन धर्म के गौरव गुरुवर, तुम सा ही मैं होऊँ सत्वर।
भावलिंगमय सन्त तुम्हें हैं, लाखों प्रणाम…।।5।।

दृष्टि में ध्रुव शुद्ध आत्मा, ज्ञान अहो अनुभवे आत्मा।
हो रमण आत्मा में ही गुरुवर, लाखों प्रणाम…।।6।।

तुमको अंतर में ही निरखती, भक्ति ह्रदय में आज उछलती।
है सर्वस्व समर्पण तुमको, लाखों प्रणाम…।।7।।