सिद्धक्षेत्र सम्मेदशिखर जयवंत रहे।
तीर्थराज सम्मेदशिखर जयवंत रहे ॥ टेक ॥
बीस तीर्थंकर सिद्ध हुए हैं, अगणित मुनिवर मुक्त हुए हैं।
वंदन अगणित बार, शिखर जयवन्त रहे ॥ 1 ॥
चरण उन्हीं की याद दिलाते, अक्षय सुख का मार्ग दिखाते।
धर्म तीर्थ अविकार, सदा जयवन्त रहे ॥ 2 ॥
रत्नत्रय का राज्य यहाँ है, शान्ति का साम्राज्य यहाँ है।
शुद्धातम सुखकार, सदा जयवन्त रहे ॥ ३॥
यहाँ सहज ही भाव बदलते, ज्ञान और वैराग्य उछलते ।
आनंद अपरम्पार, सदा जयवंत रहे ॥ 4॥
हम भी निज आतम पहिचानें, हेय-ज्ञेय-आदेय सु जानें।
साधें शुद्ध स्वभाव सदा जयवंत रहे ॥ 5॥
शाश्वत सिद्धक्षेत्र पर आये, यही मार्ग हमको भी भाये।
खोलें मुक्ति द्वार, सदा जयवन्त रहे ॥ 6 ॥
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ २९७
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’