शुद्धातम आयो दृष्टि में, आनन्द भयो सब सृष्टि में
(तर्ज: महावीर झूले नयन में)
शुद्धातम आयो दृष्टि में, आनन्द भयो सब सृष्टि में,
परमानन्द पायो अपने में, सहजानन्द पायो अपने में ।
ज्ञानानन्द पायो अपने में, नित्यानन्द पायो अपने में ।।टेक।।
नहीं सुहाय आन रस फीके, अनुभव रस प्रगट्यो निज में ।
धूल समान लगे जग वैभव, निज वैभव पायो निज में ।।1।।
लगे क्लेशशमय पर की प्रभुता, निज प्रभुता प्रगटी निज में ।
मन नहीं भावे पर की शोभा, निज शोभा देखी निज में ।।2।।
प्रभु बहुमान सहज ही आवे, मन लागे गुण चिन्तन में ।
होवे स्तुति प्रभु वचनों में, शीश झुके तब चरणन में ।।3।।
धन्य मग्न हो प्रभु अपने में, मग्न रहूँ मैं अपने में ।
मुक्तिमार्ग पायो अपने में, मुक्ति मिलेगी अपने में ।।4।।
स्रोत: जिनवाणी भक्ति, पृष्ठ ८९ से ९०