सम्यग्दर्शन माहात्म्य (सम्यग्दर्शन मित्र हमारा, देता) | samyagdarshana mahatmya samyagdarshana mitra hamara deta

सम्यग्दर्शन मित्र हमारा, देता सुख अपारा।

वीतराग विज्ञान सार है, सब संसार असारा।। 1।।

ये संसार के दुःख से बचावे, करता भव से पारा।
हमको अपनी निधि दिखाये, हो कर्मों से छुटकारा ।। 2 ।।

एक बार यदि दर्शित होवे, आत्म झलक सुखकारा।
तो फिर नरक-नपुंसक-स्त्री, हीन देव दुखकारा।। 3।।

नीच गोत्र में जन्म न होवे, अल्पायु दारिद्र न धारा।
जिनवृष-धन-वैभव सुख पावे, ऋद्धि सिद्धि परिवारा।। 4 ।।

उनकी कीर्ति आज तक कायम, जिनने सम्यक् धारा।
अतः आत्मन् ! प्राप्ति हेतु अब निज की ओर चितारा ।। 5 ।।


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ३८३
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’