श्री मुनि राजत समता संग | Shri Muni Raajat Samta Sang

श्री मुनि राजत समता संग, कायोत्सर्ग समाहित अंग ।।टेक ।।

करतैं नहिं कछु कारज तातैं, आलम्बित भुज कीन अभंग।
गमन काज कछु हू नहिं तातैं, गति तजि छाकें निज रसरंग ।।१।।

लोचनतैं लखिवौ कछु नाहीं, तातैं नासा दृग अचलंग।
सुनिवे जोग रह्यो कछु नाहीं, तातैं प्राप्त इकंत सुचंग ।।२।।

तहँ मध्यान्ह माहिं निज ऊपर, आयो उग्र प्रताप पतंग।
कैधौं ज्ञान पवनबल प्रज्वलित, ध्यानानलसौं उछलि फुलिंग ।।३।।

चित्त निराकुल अतुल उठत जहँ, परमानन्द पियूष तरंग।
`भागचन्द’ ऐसे श्रीगुरुपद, वंदत मिलत स्वपद उत्तंग ।।४।।

Artist : Pt. Shri Bhagchand Ji

Singer: @Samay

12 Likes

जय जिनेंद्र,
हम में से कोई क्या इस सुंदर भजन का हिंदी में सामान्य अर्थ कर पोस्ट कर सकता है, अगर ऐसा हो सके, तो आपकी बहुत बहुत अनुकम्पा होगी :folded_hands:t2::folded_hands:t2:

आपको किस भाषा में इसका अनुवाद चाहिए?

हिन्दी अर्थ चाहिए भैया :blush:

1 Like

जय जिनेंद्र,

ये Gemini से अर्थ कराया है, मैंने एक बार तो proofread कर लिया है, अगर कोइ त्रुटि हो तो कृपया share करें।

टेक (मुखड़ा)

श्री मुनि राजत समता संग, कायोत्सर्ग समाहित अंग।

  • शब्दार्थ:

    • राजत: सुशोभित होते हैं।

    • समता संग: समभाव (राग-द्वेष रहित परिणाम) के साथ।

    • कायोत्सर्ग: शरीर के मोह का त्याग (खड़ी मुद्रा)।

    • समाहित: एकाग्र या स्थित।

  • अन्वयार्थ: श्री मुनिराज समता भाव के साथ सुशोभित हो रहे हैं, जिनके शरीर के अंग कायोत्सर्ग मुद्रा में पूरी तरह स्थिर और लीन हैं।

पद १

करतैं नहिं कछु कारज तातैं, आलम्बित भुज कीन अभंग।

गमन काज कछु हू नहिं तातैं, गति तजि छाकें निज रसरंग ।।

  • शब्दार्थ:

    • तातैं: इसलिए / उस कारण से।

    • आलम्बित: नीचे की ओर लटकायी हुई।

    • भुज: भुजाएं (हाथ)।

    • अभंग: अटूट/बिना हिले-डुले।

    • गति तजि: चलना छोड़कर।

    • छाकें: तृप्त होना/मग्न होना।

    • निज रसरंग: आत्मा के आनंद के रंग में।

  • अन्वयार्थ: मुनिराज को अब संसार का कोई कार्य सिद्ध करना शेष नहीं है, इसलिए उन्होंने अपनी भुजाओं को बिना किसी हलचल के सीधा नीचे लटका दिया है। उन्हें अब कहीं आने-जाने का प्रयोजन नहीं है, इसलिए वे बाहरी गमन छोड़कर अपनी आत्मा के आत्मीय आनंद में पूरी तरह तृप्त हैं।

पद २

लोचनतैं लखिवौ कछु नाहीं, तातैं नासा दृग अचलंग।

सुनिवे जोग रह्यो कछु नाहीं, तातैं प्राप्त इकंत सुचंग ।।

  • शब्दार्थ:

    • लोचनतैं: आँखों से।

    • लखिवौ: देखना।

    • नासा दृग: नासिका के अग्र भाग पर दृष्टि।

    • अचलंग: जो चलायमान न हो (अचल)।

    • जोग: योग्य।

    • इकंत: एकांत (शुद्ध आत्म-स्वरूप)।

    • सुचंग: श्रेष्ठ/सुंदर।

  • अन्वयार्थ: आँखों से अब कुछ भी (सांसारिक) देखने योग्य नहीं बचा है, इसलिए उनकी दृष्टि नासिका के अग्र भाग पर स्थिर होकर अचल हो गई है। अब संसार में कुछ भी सुनने योग्य नहीं रहा है, इसलिए उन्होंने अपने भीतर के सुंदर और श्रेष्ठ एकांत स्वरूप को प्राप्त कर लिया है।

पद ३

तहँ मध्यान्ह माहिं निज ऊपर, आयो उग्र प्रताप पतंग।

कैधौं ज्ञान पवनबल प्रज्वलित, ध्यानानलसौं उछलि फुलिंग ।।

  • शब्दार्थ:

    • मध्यान्ह: दोपहर।

    • उग्र: तीव्र/प्रचंड।

    • प्रताप: तेज।

    • पतंग: सूर्य।

    • कैधौं: अथवा/या फिर (संदेह अलंकार)।

    • ध्यानानल: ध्यान रूपी अग्नि (ध्यान + अनल)।

    • फुलिंग: चिंगारियां।

  • अन्वयार्थ: उस समय दोपहर में मुनिराज के ऊपर सूर्य अपने प्रचंड तेज के साथ तप रहा है। (उसे देखकर ऐसा लगता है) मानो ज्ञान रूपी वायु के बल से प्रज्वलित हुई उनकी ध्यान रूपी अग्नि से कर्मों को जलाने वाली चिंगारियां ऊपर की ओर उछल रही हों।

पद ४

चित्त निराकुल अतुल उठत जहँ, परमानन्द पियूष तरंग।

‘भागचन्द’ ऐसे श्रीगुरुपद, वंदत मिलत स्वपद उत्तंग ।।

  • शब्दार्थ:

    • निराकुल: बिना किसी व्याकुलता या चिंता के।

    • अतुल: जिसकी तुलना न हो सके।

    • पियूष: अमृत।

    • तरंग: लहरें।

    • वंदत: वंदना करने से।

    • स्वपद: अपना स्वयं का स्वरूप (सिद्ध पद)।

    • उत्तंग: ऊँचा/सर्वोच्च।

  • अन्वयार्थ: जहाँ मुनिराज के भीतर निराकुल और अतुलनीय आनंद उठ रहा है और परमानंद रूपी अमृत की लहरें हिलोरें ले रही हैं। कवि ‘भागचन्द’ कहते हैं कि ऐसे श्रेष्ठ गुरु के चरणों की वंदना करने से जीव को अपना स्वयं का सर्वोच्च पद (मोक्ष) प्राप्त हो जाता है।