है उपादेय तिहूँ लोक में, अकेलो शुद्धातम | Hai Upadey Tihu Lok Mem Akelo Suddhatam

है उपादेय तिहूँ लोक में, अकेलो शुद्धातम ।

अकेलो शुद्धातम, ध्रुव रूप शुद्धातम । ।टेक ।।

है स्वयंसिद्ध परमात्मा, परिशुद्ध शुद्धातम ।
निर्दोष शुद्धातम, नीराग शुद्धातम ।।1।।

है हेय सब बर्हितत्त्व, उपादेय शुद्धातम ।
चिन्मात्र शुद्धातम, चिन्मय हूँ शुद्धातम । ।2 ।।
निरपेक्ष ज्ञाता रूप हूँ, निरूपाधि शुद्धातम।
मंगलमय शुद्धातम, आनन्दमय शुद्धातम ।।3।।

पर्यायों से भिन्न जो, नहिं गुण भेद दिखाय।
अहो अभेद आनन्दमय, ज्ञायक प्रभु दरशाय । ।4।।
प्रीति अप्रीति जहाँ नहीं, बंध न मोक्ष दिखाय।
अभेद अनुभव आवतो, शिव स्वरूप कहलाय ।।5।।

हूँ निःशल्य निर्ग्रन्थ प्रभु, अनुपम रूप महान्।
नित्य शुद्ध चैतन्यमय, परम विभव की खान।।6।।

अशरीरी अच्युत अहो, विश्व ऊपर तैराय।
तीनलोक चूड़ामणि, पंचम भाव सुहाय । ।7 ।।
अरस कहा फिर भी अहो, परम सरस चिद्रूप।
ज्ञानानंद छलकाय नित, समयसार शिवरूप।।8।।


स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’