शान्ति जिनवर झलकती है, आपकी शान्त मूरति से | shanti jinavara jhalakati hai apaki shanta murati se

तर्जः हमें संस्कार सिखलाती हमारी पाठशाला है …

शान्ति जिनवर झलकती है, आपकी शान्त मूरति से।

तृप्त हो मुक्तिपथ पाते, भव्य जन शान्त मूरति से ।। टेक ।।

स्व-पर का ज्ञान सिखलाती, अचल ध्रुव ध्यानमय मुद्रा।
क्षमादिक धर्म प्रगटाती, सौम्य अन्तर्मुखी मुद्रा ।।
संयोगी दृष्टि मिट जाती, दर्शकर शान्त मूरति से ।। 1।।

धन्य ध्रुव ज्ञानमय ज्ञायक, धन्य आनन्दमय ज्ञायक ।
धन्य दृग-ज्ञान-चारित रूप, होवे परिणमित ज्ञायक।।
दिखें शुद्ध कार्य-कारण तत्त्व, प्रभुवर शान्त मूरति से ।। 2 ।।

स्वयं सिद्ध आप प्रभु स्वामी, स्वयं में तृप्त हे स्वामी।
स्वयं में मग्न हे स्वामी, स्वयं में मुक्त हे स्वामी ।।
लुब्धता ज्ञेयों की मिटती, आपकी शान्त मूरति से ।। 3।।

विभव जग का दिखे निस्सार, विभुवर आपको लखकर ।
दिखे इक सार प्रभुतामय, निजातम आपको लखकर ।।
आप सम आपको पाऊँ, भाव हो शान्त मूरति से ।। 4।।


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १०० से १०१
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’