होगी धन्य घड़ी जब प्रभुवर, विचरूँ सहज दिगम्बर वेश | hogi dhanya gha di jaba prabhuvara vicharu n sahaja digambara vesha

तर्जः मैया त्रिशला तेरो लाल जगत् को…

होगी धन्य घड़ी जब प्रभुवर, विचरूँ सहज दिगम्बर वेश।
सहज दिगम्बर वेश, होवे नहीं परिग्रह लेश ॥ टेक ॥
देह मात्र भी दिखे परिग्रह, ध्याऊँ नाथ विदेह ।
चित्प्रकाशमय महल है शाश्वत, निवसूँ अपने गेह ॥ 1 ॥

विषय अभेद शुद्ध आतम इक, अन्य विषय नहीं होय।
निरारम्भ निज आनंद वेदूँ, जगे कषाय न कोय॥ 2 ॥

बाह्य दिगम्बर परम निरम्बर, सहज चिदम्बर रूप।
तृप्त स्वयं में सहज सदा, निर्ग्रन्थ स्वरूप अनूप ॥ 3 ॥

उपसर्गों में क्षोभ न वर्ते, वर्ते आतम ध्यान ।
कर्म जलें पर जलूँ नहीं मैं, प्रगटे पद निर्वाण ॥4॥


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १८७
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’