श्री मल्लिनाथ स्तुति | shri mallinatha stuti

तर्ज : वीतराग सर्वज्ञ हितंकर भविजन की …

बाल ब्रह्मचारी अविकारी, जय-जय मल्लिनाथ भगवान् ।
यही भावना सहज पूर्ण हो, सुखमय ब्रह्मचर्य अम्लान ।। 1 ।।

आदर वर्ते निज स्वभाव का, क्रोध अनादर रूप न हो।
महिमा वर्ते चित्स्वरूप की, पर की महिमा कभी न हो ।। 2 ।।

प्रभुतामय निज अनुभव वर्ते, मायाचार न किंचित् हो।
रहूँ सदा संतुष्ट स्वयं में, लोभ रंच नहीं पर का हो।। 3।।

हास्य न होवे, रति नहिं उपजे, अरति शोक प्रभु लेश न हो ।
निर्भय रहूँ निशंक तत्त्व प्रति, भाव जुगुप्सा शेष न हो।। 4 ।।

परम ब्रह्म में मग्न रहूँ नित, सहजानन्दमय जीवन हो।
निर्मूलन होवे काम भाव का, लगे नहीं अतिचार प्रभो।। 5।।

होय न मूर्च्छा पर द्रव्यों में, निज में जागृत रहूँ सदा।
पर भावों की सन्तति टूटे, रहूँ सु जाननहार सदा।। 6।।

महाभाग्य से रत्न सु पाया, श्री जिनधर्म माँहि सुखकार।
तृप्त हुआ निज में ही स्वामिन् ! शुद्धातम ही है बस सार ।। 7 ।।

शुद्धातम ही इक अवलम्बन, शुद्धातम ही तारणहार।
शुद्धातम के आराधनमय, भाव नमन हो प्रभु सुखकार ।। 8 ।।


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १०१ से १०२
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’