हूँ तो कहा करूँ कित जाऊँ, सखी अब कासौं पीर कहूं री! ।।टेक।।
सुमति सती सखियनिके आगैं, पियके दुख परकासै ।
चिदानन्दवल्लभ की वनिता, विरह वचन मुख भासै ।।१।। हूँ तो. ।।
कंत बिना कितने दिन बीते, कौंलौं धीर धरौं री ।
पर घर हाँडै निज घर छांडै, कैसी विपति भरौं री ।।२।। हूँ तो. ।।
कहत कहावतमें सब यों ही, वे नायक हम नारी ।
पै सुपनैं न कभी मुँह बोले, हमसी कौन दुखारी ।।३।। हूँ तो. ।।
जइयो नाश कुमति कुलटाको, बिरमायो पति प्यारो ।
हमसौं विरचि रच्यो रँग वाके, असमझ (?) नाहिं हमारो ।।४।। हूँ तो. ।।
सुंदर सुघर कुलीन नारि मैं, क्यौं प्रभु मोहि न लोरैं ।
सत हू देखि दया न धरैं चित, चेरीसों हित जोरैं ।।५।। हूँ तो. ।।
अपने गुनकी आप बड़ाई, कहत न शोभा लहिये ।
ऐरी! वीर चतुर चेतनकी, चतुराई लखि कहिये ।।६।। हूँ तो. ।।
करिहौं आजि अरज जिनजीसों, प्रीतमको समझावैं ।
भरता भीख दई गुन मानौं, जो बालम घर आवैं ।।७।। हूँ तो. ।।
सुमति वधू यौं दीन, दुहागनि, दिन-दिन झुरत निरासा ।
‘भूधर’ पीउ प्रसन्न भये विन, बसै न तिय घरवासा ।।८।। हूँ तो. ।।
Artist: पं. श्री भूधरदास जी
स्रोत: भूधर भजन सौरभ, पृष्ठ ११५ से ११६