स्वागत गान (पृथुल प्रतीक्षा थी ओ पावन) | Swagat Gaan (Prathul Pratiksha Thi O Pavan)

पूज्य गुरुदेव श्री के प्रथम बार कोटा पदार्पण पर, 30 अप्रैल 1959

पृथुल प्रतीक्षा थी ओ पावन ! चिंतामणि से पाये
अरे पाप की दावा में, जिसका अन्तर झुलसा हो
और पुण्य के पागल-पन में जो खिलखिल हुलसा हो
सुप्त हुई हो जिसकी प्रज्ञा जड़ता सी छाई हो
ज्ञान-चेतना में जिसकी चिर-तन्द्रा ही छाई हो
चिर-विमुक्ति पाने को वह इनके चरणों में आये
पृथुल प्रतीक्षा थी ओ पावन ! चिंतामणि से पाये

है उत्तुंङ्ग हिमाचल-सा अति धवल-हिमानी मानस
क्षमता अद्भुत ! ज्यों लोहे को कंचन करता पारस
प्रतिपल पावन प्रज्ञा से वह राग धुला जाता है
रे! विकार का जड़ बंधन भी सहज खुला जाता है
यह पीयूष-गिरा हम पामर तुझसे ही पी पाये
पृथुल प्रतीक्षा थी ओ पावन ! चिंतामणि से पाये

स्वच्छ दृष्टि से देखा करते क्षणिक विश्व का अभिनय
काल-कूट-विष भी वैसा ही जैसा धवल-सुधा-पय
सीपी-सम्पुट में मोती के दाने से उज्जवल हो
क्योंकि निरन्तर पीते अन्तर स्वाति-बिन्दु निर्मल हो
जैसी दृष्टि सृष्टि वैसी ही प्रतिपल बनती जावे
पृथुल प्रतीक्षा थी ओ पावन ! चिंतामणि से पाये

कर्तृवाद की कारा में घुटती थी युग की श्वासें
मृगतृष्णा में पड़े बिलखते थे मृग चिर के प्यासे
अनजाने किस विधि-विधान से मरु में सरिता लहरी
महानाश की बेला में तुम बनकर आये प्रहरी
अरे ! भयंकर भव-भँवरों से तुमने प्राण बचाये
पृथुल प्रतीक्षा थी ओ पावन ! चिंतामणि से पाये

पूज्या विदुषी चंपा, शांता की है अकथ कहानी
अन्तर्दृष्टि बिना न कभी ये जा सकती पहिचानी
ये सौराष्ट्र वकील रामजी उच्च कोटि के प्लीडर
अब चैतन्य वकील वही सौराष्ट्र संघ के लीडर
पूज्य खेमजी, हिम्मत प्रभृति के गुण कैसे गायें
पृथुल प्रतीक्षा थी ओ पावन ! चिंतामणि से पाये

अरे ! चन्द्र के नक्षत्रों-सा यह तेरा परिकर है
और तुम्हारी शशि-द्युति से ज्योतित इनका अन्तर है
ये हैं मीन, सलिल तुम हो, तुम प्राण और ये काया
स्वर्ण-पुरी में किस भव का यह चित्र सहज उतराया
हम सब दीन मात्र श्रद्धा के सुमन चरण में लाये
पृथुल प्रतीक्षा थी ओ पावन ! चिंतामणि से पाये

रचयिता: श्री बाबू जुगलकिशोर जैन ‘युगल’ जी, कोटा
प्रस्तुति: आचार्य कुन्दकुन्द फाउंडेशन, कोटा

खोज: स्वागत गान, पृथुल प्रतीक्षा थी ओ पावन, चिंतामणि से पाये, swagat gaan, prathul pratiksha thi o pavan, chintamani se paye