सम्बोधन (सदा संतोष कर प्राणी) | Sambodhan (Sada Santosh Kar Prani)
सदा संतोष कर प्राणी, अगर सुख से रहा चाहे,
घटा दे मन की तृष्णा को, अगर अपना भला चाहे ।
आग में जिस कदर ईन्धन, पड़ेगा ज्योति ऊँची हो,
बढ़ा मत लोभ की तृष्णा, अगर दुख से बचा चाहे ।१ ।
वही धनवान है जग में, लोभ जिसके नहीं मन में,
वह निर्धन रंक होता है, जो परधन को हरा चाहे ।२ ।
दुखी रहते हैं वह निशदिन, जो आरत-ध्यान करते हैं,
न कर लालच अगर आजाद, रहने का मजा चाहे ।३ ।
विना मांगे मिले मोती, ‘न्यायमत’ देख दुनियाँ में,
भीख मांगे नहीं मिलनी, अगर कोई गहा चाहे ।४ ।
Artist: न्यायमत
स्रोत: पूजन-पाठ-प्रदीप (सातवां संस्करण, देहली), पृष्ठ ३९५