समयसार ही परमामृत है, भविजन के मन भाए।
सुनकर अन्तर्दृष्टि करे, वह अजर अमर पद पाए।। टेक।।
पामर नहीं सदा ही प्रभु हूँ, यह संकल्प जगाए।
पर-निरपेक्ष सहज आनन्दमय, स्वयं सिद्ध दरशाए।।1।।
निज की महिमा सुनकर मेरे, आनन्द उर न समाए।
अब तो चक्री इन्द्रादिक पद भी, नहीं मुझे लुभाऐ ।।2।।
स्वयं-स्वयं में पूर्ण स्वयं से, कर्त्ता बुद्धि नशाए।
तीनलोक सिरताज आत्मा, उपमा कही न जाए।।3।।
निज आतम को बिन जाने ही, भव-भव में भटकाए।
आत्म प्रतीति अनुभव थिरता से शिवपद प्रगटाए।।4।।
निज चैतन्य प्रकाश अलौकिक, आज मुझे दिखलाए।
अखिल विश्व में मोह अंधेरा, कही नजर नही आए।।5।।
जगे परम पुरुषार्थ धन्य मुनि दशा शीघ्र प्रगटाए।
घोर परीषह उपसर्गों में, चित्त नहीं चिग पाए।।6।।
मंगलमय रत्नत्रय परिणति, अविरल बढ़ती जाए।
यथाख्यात चारित्रमयी, अरहंत दशा विलसाए।।7।।
दिव्यध्वनि द्वारा जग को, फिर दिव्यतत्त्व दरशाए।
शेष अघाति कर्म नाश कर, परमसिद्ध पद पाए।।8।।
स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’