सहज निराकुल परम शान्तिमय, प्रभुवर स्वाश्रित जीवन हो ।
झलकें ज्ञेय भले ही सारे, ज्ञानमयी ही अनुभव हो ।।टेक।।
निज में तृप्ति निज में तुष्टि, पर द्रव्यों की चाह नहीं ।
चाहे जैसा कर्मोदय हो, किंचित् भी परवाह नहीं ।।1।।
नहीं द्वेष हो निंदक के प्रति, नहीं प्रशंसक के प्रति राग ।
द्रव्यदृष्टि का बल हो अद्भुत, जीवन में हो सहज विराग ।।2।।
रहे नि:शंकित निर्भय परिणति, … आनन्दमयी ।
सहज रूप निर्ग्रन्थ दशा हो, साम्यरूप वात्सल्यमयी ।।3।।
नहीं परिग्रह रंचमात्र हो, सहन शीलता का नहिं अंत ।
परीषहों उपसर्गों में भी, आत्म-ध्यानमय रहे बसंत ।।4।।
निर्विकल्प निवृत्ति ज्ञानमय, निज में ही पाया विश्राम ।
करने का अवकाश न दिखे, ध्याऊँ क्षण-क्षण आतमराम ।।5।।
आतमराम मैं आतमराम, ज्ञानानन्दमय आतमराम ।
स्वयं-स्वयं में पूर्ण सदा ही, परम प्रभु मैं आतमराम ।।6।।
स्रोत: जिनवाणी भक्ति, पृष्ठ ८४ से ८५