हे माँ जिनवाणी आतम रूप सु ध्याऊँ | he ma n jinavani atama rupa su dhyau n

तर्जः जिनवाणी माता दर्शन की बलिहारियाँ…

हे माँ जिनवाणी आतम रूप सु ध्याऊँ।
हे माँ जिनवाणी बोधि समाधि पाऊँ ॥ टेक ॥
आत्मज्ञान बिन भटकत-भटकत, दुर्लभ अवसर पायो।
तत्त्व प्रीति जागी अन्तर में, जिनशासन मन भायो ॥ 1 ॥

विषय-भोग दुखमय ही दीखें, सब संसार असारा।
दुर्विकल्प सब मिथ्या भासें, पायो पद अविकारा ॥ 2 ॥

लगे कलंक समान परिग्रह, निर्ग्रन्थ पद सुखकारी।
साक्षात् मुक्ति का मारग, पाऊँ मंगलकारी।। 3।।

जीतूं सहज उपसर्ग परीषह, निज में ही थिरता हो।
कर्म-कलंक समूल नशावें, ज्ञानमयी समता हो॥ 4 ॥

कुछ न कामना, सहजपने निष्काम सदैव रहाऊँ।
अन्तर्दृष्टि प्रदाता माता, सविनय शीश नवाऊँ ॥ 5॥


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १६०
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’