होवे कब निर्ग्रन्थ दशा | Hove Kab Nirgranth Das

होवे कब निर्ग्रन्थ दशा।।टेक ।।

भेदज्ञान की धारा वर्ते, वेदूँ सहजानंद अहा।
चाहे जैसे जगत् परिणमे, रहूँ परम निरपेक्ष सदा।।1।।

तृप्त रहूँ निज से ही निज में, अक्षय आतम विभव लखा।
नहीं जरूरत पर की किंचित्, स्वयं स्वयं में पूर्ण दिखा।।2।।

शक्ति अनंतमयी शुद्धातम, शाश्वत प्रभु अन्तर विलसा।
धन्य हुआ संतुष्ट हुआ मैं, ऐसा संचेतन प्रगटा।।3।।

हूँ स्वभाव से ज्ञाता-दृष्टा, स्वयंसिद्ध निर्मुक्त सदा।
निज में ही निज को ध्याऊँ, यही सहज निष्काम दशा।।4।।

ग्रन्थि न कोई, द्वंद न कोई, नहीं संकल्प विकल्प कदा।
नहीं आडंबर, परम दिगम्बर, जगत्पूज्य जिनरूप लखा ।।5 ।।

शिवपथ के आदर्श मुनीश्वर, सहज भक्ति से शीश झुका।
उनके संघ में निज हित साधूँ, भाव यही उर में उमगा ।।6।।


स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’
स्रोत: जिन-भक्ति सिंधु, पृष्ठ २३५ से २३६