समुझ सबद यह मेरा | samujh sabad yah mera

भोंदू भाई! समुझ सबद यह मेरा।
जो तू देखे इन आंखिन सौं, तामैं कछु न तेरा।।टेक।।

ए आंखें भ्रम ही सौं उपजी, भ्रम ही के रस पागी।
जहँ जहँ भ्रम तहँ-तहँ इनको श्रम, तू इन ही कौ रागी।।१।।

ए आखें दोउ रची चाम की, चामहि चाम बिलोवै।
ताकी ओट मोह निद्रा जुत, सुपन रूप तू जोवै।।२।।

इन आंखिन कौ कौन भरोसौ, एक विनसें छिन माही।
है इनको पुद्गल सौं परचै, तू तो पुद्गल नाहीं।।३।।

पराधीन बल इन आखिन कौ, विनु प्रकाश न सूझै।
सो परकाश अगनि रवि शशि को, तू अपनौं कर बूझे।।४।।

खुले पलक ए कछू इक देखहि, मुंदे पलक नहिं सोऊ।
कबहूँ जाहि होंहि फिर कबहूँ, भ्रामक आँखें दोऊ।।५।।

जंगम काय पाय एक प्रगटै, नहिं थावर के साथी।
तू तो मान इन्हें अपने दृग, भयौ भीम को हाथी।।६।।

तेरे दृग मुद्रित घट-अन्तर, अन्ध रूप तू डोलै।
कै तो सहज खुलै वे आंखें, कै गुरु संगति खोले।।७।।


स्रोत: मङ्गल भक्ति सुमन (२०२४), पृष्ठ १६९

अर्थ

जीव-जगत्में दृष्टिका प्राप्त होना सरल नहीं है। संसारके सभी देहधारियोंको दृष्टि नहीं मिलती। जीव-राशिमें इस प्रकारक बहुत कम हैं जिन्हें दृष्टि-लाभका सौभाग्य मिलता है। यहां दृष्टिसे अर्थ देखने की शक्तिसे है। जो वस्तुका ठीक-ठीक दर्शन कराने में समर्थ हो उसे दृष्टि कहते हैं। इस प्रकार जिसे दृष्टि मिली है उसे वस्तुका यथार्थ दर्शन तो करना ही चाहिए, परन्तु आश्चर्य तब होता है जब दृष्टि प्राप्त होने पर भी मानव वस्तुको ठीक रूपसे देख नहीं पाता। कारण स्पष्ट है। मानवकी दृष्टि- चर्म-चक्षुका ऐसे तत्त्वोंसे निर्माण हुआ है, जो उसे वस्तुके अन्तर रूपका दर्शन नहीं हो पाता। जो कुछ उसे दिखलाई देता है, उसमें वस्तुका सम्पूर्ण रूप नहीं होता, केवल बाह्यरूप रहता है और यही कारण है जो मानवकी दृष्टि वस्तुक्रो ठीक न समझकर भ्रान्त होती है और मानवको मिथ्यामार्ग का यात्री बनाकर अशान्त करती है। कलाकारने अपनी इस रचनामें इसी दृष्टिका विश्लेषण किया है और बतलाया है कि वस्तुका यथार्थ और सम्पूर्णरूप समझनेके लिए किस दृष्टिकी आवश्यकता होती है तथा वह किस प्रकारसे प्राप्त की जा सकती है। कलाकारकी सूक्तिका रस लीजिए:-“भोंदू भाई, समुझ शबद यह मेरा । जो तू देखे इन आँखिनसौं तामें कछू न तेरा । भोंदू भाई, समुझ शबद यह मेरा ।” अरे भोले मानव, तुम मेरी इस बात पर तो विचार करो ।

मानव, जो कुछ तुम इन आँखोंसे देख रहे हो और अपना समझ रहे हो उसमें तुम्हारा कुछ भी नहीं है। अरे भोले मानव, तुम मेरी इस बात पर तो विचार करो । देखिए, कलाकार इन चर्म-चक्षुओंका किस प्रकार विश्लेषण कर रहे हैं:-

ए आँखें भ्रम ही सौं उपजी भ्रम ही के रस पागी ।

अरे मानव, ये आंखें भ्रम ही से उत्पन्न हुई हैं और भ्रम हीके रसमें सनी हुई हैं। याद रख, जहाँ-जहाँ भ्रम है, वहाँ-वहाँ इन आँखोंका भ्रम है। अर्थात् प्रत्येक भ्रमके मूलमें इन आँखोंका ही प्रधान हाथ है। फिर भी तू इन आँखोंका रागी बना हुआ है।

ए आंखें दोउ रची चामकी, चामहि चाम विलोवै ।

मानव, ये दोनों ही आँख चमड़ेकी बनी हैं और चर्म-चर्मक सिवाय वस्तुके अन्तर रूपका दर्शन तो इनसे हो ही नहीं सकता । अरे मानव, ये वही आँखें तो है, जिनके कारण तू मोह-निद्रामें मग्न होता है और संसार को स्वप्नवत् समझता है ।

इन आंखिन को कौन भरोसौ, ए विनसें छिन माहीं ।

मानव, इन आँखोंका क्या भरोसा ? ये तो क्षणभरमें नष्ट हो सकती

है। इनका तो पुद्गलसे परिचय है। पर मानवात्मन्, तू तो पुद्गल नहीं है। फिर तू पर-वस्तु पर क्यों इतना राग और विश्वास करता है ?

स्रोत: अध्यात्म पदावली।

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