है यही भावना हे स्वामिन् | Hai Yahi Bhavna He Swamin

जिन-स्तवन
है यही भावना हे स्वामिन्, तुम सम ही अन्तर्दृष्टि हो।
है यही कामना हे प्रभुवर, तुम सम ही अन्तर्वृत्ति हो ॥टेक॥

तुमको पाकर सन्तुष्ट हुआ, निज शाश्वत पद का भान हुआ।
पर तो पर ही है देह स्वांग, तुमको लख भेदविज्ञान हुआ।
मैं ज्ञानानन्द स्वरूप सहज, ज्ञानानन्दमय मम सृष्टि हो ।।१।।

तुम निर्मोही रागादि रहित, निष्काम परम निर्दोष प्रभो।
निष्कर्म, निरामय, निष्कलंक, निर्ग्रन्थ सहज अक्षोभ अहो।
मेरा भी ऐसा ही स्वरूप, अनुभूति धर्ममय वृष्टि हो ।।२।।

इन्द्रादिक चरणों में नत हों, पर आप परम निरपेक्ष रहो।
अक्षय वैभव अद्भुत प्रभुता, लखते ही चित आनन्दमय हो।
हे परमपुरुष आदर्श रहो, उर में निष्काम सु-भक्ति हो ।।३।।

संसार प्रपंच महा-दु:खमय, मेरा मन अति ही घबड़ाया।
होकर निराश सबसे प्रभुवर, मैं चरण-शरण में हूँ आया।
मम परिणति में भी स्वाश्रय से, रागादिक की निवृत्ति हो ।।४।।

जगख्याति-लाभ की चाह नहीं, हो प्रगट आत्मख्याति जिनवर।
उपसर्गों की परवाह नहीं, आराधना हो सुखमय प्रभुवर।
सब कर्म कलंक सहज विनशें, विभु निजानन्द में तृप्ति हो ।।५।।

Artist - ब्र.श्री रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’

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