हम तो कबहुँ न निज घर आये | hama to kabahu.n na nija ghara aye

परघर फिरत बहुत दिन बीते, नाम अनेक धराये ॥हम तो. ॥
परपद निजपद मानि मगन है, पर परनति लपटाये।
शुद्ध बुद्ध सुखकंद मनोहर, आतम गुण नहिंगाये ॥हम तो. ॥1 ॥

नर पशु देव नरक निज मान्यो, परजयबुद्ध लहाये।
अमल अखंड अतुल अविनाशी, चेतन भाव न भाये ॥हम तो. ॥2॥

हित अनहित कछु समझ्यो नाहीं, मृगजलबुध ज्यों धाये।
‘द्यानत’ अब निज-निज, पर-पर है, सद्‌गुरु वैन सुहाये ॥हम तो. ॥3 ॥


स्रोत: मङ्गल भक्ति सुमन (२०२४), पृष्ठ १८१

अर्थ

हे आत्मन् ! हम कभी भी अपने घर वापस नहीं आए अर्थात् हमने कभी भी अपनी आत्मा का चिन्तवन नहीं किया। स्वस्थान को छोड़कर अन्यत्र अर्थात् पर में ही हम भटकते रहे और अनेक बार अनेक नाम धारण किए अर्थात् बहुत बार अनेक भिन्न-भिन्न पर्यायों में अनेक नामों से जाने जाते रहे। पर पद को ही हमने अपना पद-स्थान मानकर उसमें ही मगन हो गए, अपनी आत्मा के गुणों को नहीं पहचाना, चिन्तवन नहीं किया और पर परिणति में उलझते रहे, उनसे लिपटे रहे। यह आत्मा मूल में तो शुद्ध है, ज्ञानवान है, सुख का पुंज है, सुन्दर है। उस आत्मा का चिन्तवन नहीं किया। चारों गतियों में भ्रमण करते हुए देह को ही अपना माना और पर्यायों में ही बुद्धि खपाते रहे, लगाए रहे। यह आत्मा निर्मल, अखंड व अविनाशी है। इस प्रकार चैतन्य के गुणों की भावना ही नहीं आयी। अपना हित-अहित क्या है, उसे जाना ही नहीं और न समझा। जैसे रेगिस्तान में हरिण मरीचिका के कारण मिट्टी के चमकते कणों को पानी समझकर दौड़ता है, वैसे ही हम भी सुख की खोज में भौतिक वस्तुओं की ओर भागते रहे। द्यानतराय कहते हैं कि सत्गुरु ने अब यह बोधि दी है कि यह आत्मा ही मात्र अपना है और इससे भिन्न सब पर ही पर है।

स्रोत: द्यानत भजन सौरभ, पद 157।

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