तर्ज : जिया कब तक घूमेगा संसार में…
होवे प्रभुवर सहज जीवन, होवे जिनवर सफल जीवन।
ज्ञान वैराग्यमय जीवन, धन्य आनन्दमय जीवन।।टेक ।।
जागते सोते चलते फिरते, खाते पीते उठते बैठते ।
बोलते-चालते सुनते पढ़ते, होवे आत्मा का ही दर्शन ।।1 ।।
झलके ज्ञेय भले ही सारे, कभी न इष्ट अनिष्ट विचारे।
राग-द्वेष नहीं किंचित् धारे, होवे ज्ञानमयी अनुभवन ।।2।।
निर्ग्रन्थ निर्द्वन्द निर्बन्ध वर्तु, निर्लेप निरपेक्ष स्वतंत्र वर्तुं ।
निकलंक स्थिर हो एकाकी वर्तृ, होवे समतामयी आचरण ।।3 ।।
आत्मवैभव में तुष्ट रहूँ, निज से निज में ही तृप्त रहूँ।
सहज निज में ही मग्न रहूँ, हो परम पद परम पावन।।4।।
स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’